बुजुर्गों से विमर्श जरूरी
 राजीव त्यागी 
विश्वस्तर पर वृद्धों का जनसंख्या में प्रतिशत बढ़ रहा है और इसके साथ इस बारे में बेहतर विमर्श की जरूरत है कि उनका जीवन स्वस्थ व संतोषजनक कैसे बन सके। वर्ष 1950 में विश्व का कोई व्यक्ति औसतन 46 वर्ष जीता था तो वर्ष 2023 में यह आंकड़ा 70 वर्ष तक पहुंच गया। ऐसे में जरूरी है कि वृद्धावस्था को स्वस्थ व संतोषजनक बनाने के लिए बेहतर प्रयास किए जाएं।
 हालांकि वृद्धावस्था को अधिक रोगों व स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में देखा गया है, पर हाल के समय में इस ओर अधिक महत्व दिया गया है कि समुचित सावधानियां बरत कर, अनुकूल स्थितियां उत्पन्न कर इन रोगों व स्वास्थ्य समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इस तरह वृद्धावस्था को अधिक संतोषजनक व रचनात्मक बनाया जा सकता है। जहां रोग का इलाज जरूरी है वहां यह और भी महत्वपूर्ण है कि नीतिगत व व्यक्तिगत स्तर पर बेहतर कदम उठाकर इन रोगों की संभावना को ही अपेक्षाकृत कहीं कम किया जा सकता है। 


 यदि भारत की स्थिति देखें तो वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या 10.3 करोड़ थी व उसका भारत की इस समय की जनसंख्या में 8.6 प्रतिशत का हिस्सा था। वर्ष 2050 के लिए सरकारी स्तर पर अनुमान है कि तब तक 60 वर्ष से अधिक की आयु की जनसंख्या बढ़कर 31.9 करोड़ तक पहंुच जाएगी। यह उस समय की भारतीय जनसंख्या का 19.5 प्रतिशत होगा। 

अब यदि हम अधिक वृद्ध व्यक्तियों यानी 75 वर्ष की आयु से अधिक के व्यक्तियों की बात करें तो वर्ष 2011 और वर्ष 2050 के बीच इनकी संभावित वृद्धि की दर और भी अधिक है। सरकारी स्तर का अनुमान है कि इस दौर में कुल जनसंख्या में इनके हिस्से में 340 प्रतिशत की वृद्धि होगी। इन स्थितियों को देखते हुए यह विमर्श और जरूरी हो जाता है कि उपलब्ध बजट व अन्य सीमाओं के बीच वृद्धावस्था को अधिक स्वस्थ व संतोषजनक कैसे बनाया जाए। निश्चय ही सभी वृद्ध लोगों तक समुचित पेंशन पहंुचाना बहुत जरूरी है। इसके साथ उनके स्वस्थ जीवन के लिए अनेक अन्य कदम उठाना भी आवश्यक है।

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