डिजिटल संसार में सेहत के जोखिम
- डॉ. विजय गर्ग
यह मानव स्वभाव है कि हर पीढ़ी अपने बच्चों को खुद से अधिक सुविधाएं देने का प्रयास करती है। मगर ऐसा लगता है कि आज की हमारी पीढ़ी ने अपने बच्चों को पूरी दुनिया एक छोटी सी स्क्रीन में सौंप दी है। बच्चे अब पहाड़, समुद्र, युद्ध, महामारी और उत्सव सब कुछ अंगुलियों के एक स्पर्श से देख सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या दुनिया को समझ भी पा रहे हैं? या फिर सिर्फ देख रहे हैं, बिना याद रखे, बिना गहराई से
'बेड किए? इसी प्रश्न के बीच दो नई आदतें उभरकर सामने आती हैं।
स्क्रॉलिंग संस्कृति, जो बच्चों की दृश्य स्मृति मानसिक सक्रियता को प्रभावित कर रही हैं। 'बेड-राटिंग' का अर्थ है- लंबे समय तक बिस्तर पर ही पड़े रहना और मोबाइल चलाते रहना। पढ़ाई, मोबाइल, आराम सब कुछ एक ही जगह पर यह आदत अकसर थकान उदासी के नाम पर शुरू होता है रू होती है, लेकिन धीरे-धीरे जीवनशैली बन जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब बिस्तर केवल सोने की जगह न रहकर जागने और स्क्रीन देखने का केंद्र बन जाता है, तो दिमाग को स्पष्ट संकेत नहीं मिलते। । इसका सीधा असर नींद की गुणवत्ता और स्मृति निर्माण की प्रक्रिया पर पड़ता है।"
बच्चों के मामले में यह स्थिति और भी संवेदनशील है। उनका दिमाग अभी विकसित हो रहा होता है। 'विजुअल प्रोसेसिंग' यानी दृश्य प्रसंस्करण वह क्षमता है, जिससे बच्चा आकार, रंग, दूरी, दिशा और गति को समझता है। दृश्य स्मृति वह शक्ति है, जिससे वह देखी हुई जानकारी को याद रखता है, चाहे वह शब्दों का रूप हो, किसी का चेहरा हो या रास्ते की पहचान। इन क्षमताओं का विकास केवल किताबों या स्क्रीन से नहीं होता, बल्कि वास्तविक दुनिया के अनुभवों से होता है, जैसे खुली जगह, खेल, दौड़ना, चेहरे पड़ना, , और वस्तुओं को छूकर समझना आदि। लगातार बिस्तर पर रहकर एक सीमित दूरी से स्क्रीन देखना दृश्य अनुभव को संकुचित कर देता है। ऐसे में बच्चा तेज, चमकीली और लगातार बदलती तस्वीरों का आदी हो जाता है। तंत्रिका तंत्र विज्ञान से जुड़े शोध बताते हैं कि इस तरह के एकरूप दृश्य अनुभव से मस्तिष्क के ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और दृश्य विशेष "कौशल कमजोर हो सकता है। इसका असर आगे चलकर पढ़ने-लिखने और समझने की क्षमता पर भी दिखता है।
इसी सीमित दृश्य संसार में प्रवेश करती है 'इम स्क्रॉलिंग' यानी नकारात्मक, डराने वाली और संकट से भरी सूचनाओं को बिना रुके देखते जाना महामारी, युद्ध, अपराध और आपदाओं की लगातार तस्वीरें बच्चों और किशोरों के मन में यह भावना बैठा देती हैं कि दुनिया असुरक्षित और भयावह है। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, इस तरह की आदत चिंता, अवसाद और मानसिक थकान बढ़ाती है। चिंतित दिमाग न तो ध्यान केंद्रित कर पाता है और न ही नई जानकारी को ठीक से याद रख पाता है। इसके विपरीत हाल के वर्षों में 'ब्लूम-स्क्रॉलिंग' की अवधारणा सामने आई है, यानी सकारात्मक, प्रेरक और ज्ञानवर्धक सामग्री को चुनकर देखना सही तरीके से अपनाया जाए, तो यह बच्चों में जिज्ञासा, आशावाद और रचनात्मक सोच को बढ़ा सकता है। लेकिन समस्या यह है कि अधिकांश डिजिटल मंच बच्चों को सोच-समझकर चुनने की बजाय लगातार स्क्रॉल करते रहने के लिए डिजाइन किए गए हैं। एल्गोरिदम का उद्देश्य मानसिक विकास नहीं, बल्कि स्क्रीन- समय बढ़ाना होता है। 'बेड-राटिंग' और 'स्क्रॉलिंग' संस्कृति का समग्र प्रभाव बच्चों की ध्यान क्षमता पर साफ दिखाई देता है शिक्षक बताते हैं कि बच्चे लंबे समय तक किसी पाठ पर ध्यान नहीं लगा पाते।
इस पर हुए अध्ययन इस बात का संकेत देते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन- उपयोग से क्रियाशील स्मृति और अनुक्रमिक विचारशीलता कमजोर हो सकती है। नींद इस पूरी समस्या का केंद्र है। वैज्ञानिक रूप से यह स्थापित तथ्य है। कि स्मृति विशेषकर दृश्य नींद के दौरान स्मरण शक्ति में स्थायित्व हासिल करते हैं। जब बच्चे देर रात तक बिस्तर पर स्क्रीन देखते रहते हैं, तो नींद की अवधि ही नहीं, उसकी गुणवत्ता भी घटती है। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन को दबाती है, जिससे दिमाग को आराम का संकेत नहीं मिल पाता। नतीजतन अगला दिन थकान, चिड़चिड़ेपन और ध्यान भंग के साथ शुरू होता है।
एक समय था, जब परिवार के बुजुर्ग बच्चों से सहज रूप से पूछ लेते थे- 'कोई पहाड़ा सुनाओ।' यह केवल गणित का अभ्यास नहीं था, बल्कि बच्चे की मानसिक सक्रियता को परखने | तरीका था। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो पहाड़ा याद करना क्रियाशील स्मृति, अनुक्रमित प्रसंस्करण और दृश्य श्रवण समन्वय तीनों को सक्रिय करता है। बच्चे को अंकों की का दृश्य छवि बनानी होती है, क्रम याद रखना होता है और बिना रुके सही उत्तर देना होता है। तंत्रिका तंत्र विज्ञान बताता है कि ऐसी गतिविधियां मस्तिष्क के खास हिस्सों को सक्रिय करती , जो ध्यान और स्मृति के लिए हैं।
आज जब उत्तर एक क्लिक में स्क्रीन पर मिल जाता है. तो दिमाग की वह कसरत नहीं । है। दुनिया के कई देशों ने बदलती स्थिति को गंभीरता से लिया है। फ्रांस, डेनमार्क और नावें जैसे देशों में बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त दिशा-निर्देश लागू किए गए हैं। आस्ट्रेलिया में सोलह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। यूरोप कई स्कूलों में 'डिजिटल वेल बीइंग' यानी डिजिटल तकनीक के संतुलित उपयोग को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है, बच्चे तकनीक का उपयोग करना सीखें, उसके गुलाम न बनें। भारत में तस्वीर थोड़ी जटिल है। यहां डिजिटल साधनों को शिक्षा और रूप में देखा जाता है, जो सही अवसर के रूप है मगर इस उत्साह में बच्चों के मानसिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की अनदेखी हो रही है। शहरी घरों में बच्चों का खेल मैदान मोबाइल बन न चुका है। छोटे शहरों कस्बों में भी यही सीमित और एकरूप होता जा रहा है। यह कहना जरूरी है कि समस्या तकनीक नहीं, उसका असंतुलित उपयोग है। परिणामस्वरूप बच्चों का दृश्य संसार है और न समाधान, यह एक माध्यम है। सवाल यह है कि क्या बच्चों को स्क्रीन के अलावा भी देखने, चलने, खेलने और सोचने के पर्याप्त अवसर मिल
रहे हैं? यदि नहीं, तो उनकी दृश्य स्मृति और समझ अधूरी ही रह जाएगी। इस माता-पिता की भूमिका निर्णायक है। यह स्पष्ट होना चाहिए समान का जगह है, पूरे दिन कि बिस्तर केवल सोने की जगह है, गतिविधियों केंद्र नहीं।
स्क्रीन मुक्त समय और स्थान तय करना, बच्चों के साथ बैठकर "सामग्री चुनना तथा उनके डिजिटल अनुभव पर संवाद करना आज की जरूरत है। स्कूलों को भी अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करना होगा।
डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल तकनीक का इस्तेमाल नहीं, बल्कि यह समझाना भी है कि इसमें परोसी जा रही रही सामग्री का बच्चों के दिमाग पर कैसा असर हो रहा है। बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि नकारात्मक सूचनाओं और सामग्री से मानसिक दूरी कैसे बनाई जाए और सकारात्मक जानकारी को कैसे चुना जाए। बच्चों का मानसिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य केवल परिवार की नहीं, पूरे समाज जिम्मेदारी है। उम्र-आधारित दिशा-निर्देश, डिजिटल मंच की जवाबदेही और सार्वजनिक जागरूकता, तीनों पर एक साथ काम करने की जरूरत है।
(सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब)





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