सोशल मीडिया और आगामी पीढ़ी


- डॉ. नंदलाल
                             
सोशल मीडिया आज की पीढ़ी के लिए एक आवश्यक प्लेटफॉर्म बन चुका है। न सिर्फ वर्तमान पीढ़ी इससे लिपटी हुई है अपितु अगली पीढ़ी को भी वह अपनी आगोश में ले रहा है। मुझे याद है जब ब्लैक एंड व्हाइट टीवी का आगमन हुआ था तो घर के बड़े बुजुर्ग बच्चों को दूर से टीवी देखने की बात कहते थे तथा उन्हें इस बात के लिए डांटते भी थे। उस समय के बच्चे जो आज जवान और युवा बन चुके हैं उनमें से चालीस प्रतिशत लोग चश्मा का सहारा जल्दी उम्र में ही लेने लगे। आज तो मोबाइल हर बच्चे के हाथ में है और वे बच्चे बिना मोबाइल देखे दूध भी नहीं पीते। जब बच्चे रोने लगते हैं तो बहुत सी माताएं उन्हें मोबाइल पकड़ा कर अपना काम करने लगती हैं।पिता लोगों के पास उसका कोई विकल्प नहीं बचा है।
आज के बच्चों के लिए यों कहिए तो मोबाइल एक आवश्यक खिलौना बन चुका है और वह खिलौना स्क्रीनयुक्त है जो बच्चों के लिए भौतिक रूप से नुकसान देह तो है ही,वह मानसिक स्तर भी उनके लिए खतरनाक है।कैसे कोई बचे एक चुनौती खड़ी हो चुकी है।पैसा कमाने वाले लोग इस प्रकार के रील बनाकर परोस रहे हैंजिसको बच्चे देखें।यदि बच्चा उसे एक बार देख लिया तो उन खेलों में से उन्हें जो पसंद आता है उसे वे बार बार देखते हैं। मेरे परिवार में भी ऐसे बच्चे हैं जो यह कहते हुए रोते और चिल्लाते हैं कि उन्हें "एक मोटा हाथी घूमने चला" आलू कचालू बेटा कहां गए थे" देखना है। ऐसे ही न जाने कितने एनिमेटेड गेम के लिए वे हर समय जिद करते हैं। उन्हें इस लत से कैसे निकाला जाय रास्ता समझ में नहीं आता।


दूसरों को उपदेश तो दिया जा सकता है किंतु यदि अपने ही घर में इस प्रकार की समस्या आती है तो रास्ता समझ में नहीं आता।हर प्रकार के संवेगात्मक खेल सोशल प्लेटफॉर्म पर मौजूद हैं और इस प्रकार के गेम को अपलोड करने की होड सी मची है।उन्हें तो बस पैसा कमाने की हवस है पर उन्हें पीढ़ी को संवारने की कोई चिंता नहीं है।हो भी क्यों?उनका तो पूरा परिवार ऐसे गेम को प्रमोट करने में लगा है।
   इतना ही नहीं हर आयु वर्ग के लोग अपना ज्यादातर समय सोशल मीडिया के अनाप शनाप कार्यक्रमों को देखकर बिताते हैं। ऐसे लोग जिनकी आयु तीस पैंतीस वर्ष की हो चुकी है वे लोग किसी सर्विस में होंगे, व्यवसाय में होंगे, किसी न किसी रोजगार में होंगे या बेरोजगार होंगे। वे इसका थोड़ा बहुत उपयोग तो मनोरंजन के नाम पर कर सकते हैं पर नई पीढ़ी जो दो वर्ष से तीस वर्ष के बीच की हैं उनके लिए सोशल मीडिया कौन सा ज्ञान परोस रही है ये आप और हम सभी लोग बखूबी जान रहे हैं। कक्षाओं में बैठे छात्र लेक्चर पर कम ध्यान देते हैं, मेज़ के नीचे यूट्यूब चलाते रहते हैं। मोबाइल एडिक्शन इस कदर हावी हो चुका है कि बच्चे से लेकर किशोर तक अपना ज्यादा समय इन बकवास कार्यक्रमों को ज्यादा देते हैं। ज्ञान अर्जन कम समय बर्बादी अधिक। उससे अधिक उन कार्यक्रमों का पश्चात्वर्ती प्रभाव उन अपरिपक्व बालकों पर अधिक पड़ता है जिससे उनके अंदर अच्छे मूल्यों व संस्कारों का अभाव होता जा रहा है। ये बच्चे देश की भविष्य की पीढ़ी हैं जो धीरे धीरे इन्हीं बकवास मूल्यों और संस्कारों के साथ बड़े हो रहे हैं। इनके अंदर किस तरह देशप्रेम और संस्कारयुक्त व्यवहार विकसित होंगे, चिंतनीय है।
सोशल मीडिया कुल मिलाकर हमारे देश के संस्कार और संस्कृति पर प्रहार कर रहा है जिस पर सरकार भी आंखे मूंदकर बैठी हैं ठीक उसी तरह जैसे शराब, गुटखा,और तंबाकू पर प्रतिबंध लगाती है और वे सामान कुछ दिन प्रतिबंधित रहते हैं और कुछ दिन के बाद वही सामान और वही मात्रा ठीक दोगुने दाम पर मार्केट में धड़ल्ले से बिकने लगती हैं।यही स्थिति सोशल मीडिया की है।ऐसे ऐसे प्रोग्राम लोग सोशल मीडिया में डाल रहे हैं जिनमें से सत्तर प्रतिशत प्रोग्राम सीधे तौर पर हमारी आने वाली पीढ़ी को बर्बाद करने वाले हैं।आजकल के बच्चों में इसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।एक दो धार्मिक धारावाहिकों को छोड़ दें तो अधिकांश धारावाहिक अनैतिक संबंधों का पृष्ठपोषण ही करते हैं।
        हमारी अगली पीढ़ी किस तरह अच्छे संस्कार सीखे,अच्छे आचरण सीखे,अच्छा व्यवहार सीखे,किस तरह अपने अभिभावकों का सम्मान सीखे,वृद्धों के प्रति उनका दृष्टिकोण बदले,अपने धर्म और कर्म के प्रति सहिष्णुता बढ़े,राष्ट्रीयता और देश प्रेम का भाव जगे,स्वदेशी और अपनी भाषा पर गर्व महसूस हो सके।इसके लिए सत्ता और शासन पक्ष के दृष्टिकोण में बदलाव जरूरी है।सोशल मीडिया पर परोसे जाने वाले भौंडे कार्यक्रमों की स्क्रीनिंग अति जरूरी है।


ऐसा नहीं होगा कि गौ रक्षा की बात की जाए उस पर नारे लगाए जाएं और गोमांस का सबसे बड़ा निर्यातक भारत वर्ष हो जाय।इस दोहरी मानसिकता से देश गर्त में जाएगा क्योंकि भावी पीढ़ी वही दोहरापन चरित्र भी सीखेगी।सिर्फ विकास की बात करके हिंदुत्व और भारतीयता को नहीं बचाया जा सकता।भारतीयता को बचाने और वैश्विक पहचान के लिए अपने सनातन धर्म को ऊंचाइयों पर ले जाना पड़ेगा जिसके लिए हिंदुस्तान जाना जाता है।
(महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विवि, चित्रकूट, सतना)

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