सभी बच्चों को मिले स्कूली शिक्षा
 इलमा अजीम 
कुछ समय पहले के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में करीब पांच करोड़ बच्चे बाल मजदूरी करते हैं। वहीं, राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन के अनुसार हमारे देश में हर चौथा बच्चा स्कूल से बाहर है। कारण चाहे जो हो लेकिन आज सभी बच्चों को स्कूली शिक्षा उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है। इसके लिए सरकारों को आक्रामक तरीके से काम करना होगा और शिक्षा को लेकर राजनीतिक बयानबाजी से बचना होगा। हाल ही में स्कूली शिक्षा से जुड़े विचलित करने वाले कुछ आंकड़े सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि दुनिया के 25 करोड़ बच्चे आज भी स्कूली शिक्षा से वंचित हैं। इसके बारे में संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने अपनी नई रिपोर्ट ‘एसडीजी मिडटर्म प्रोग्रेस रिव्यू’ में जानकारी दी है कि 2021 से अब तक स्कूली शिक्षा से वंचित बच्चों की संख्या कम होने की जगह बढ़ रही है और यह आंकड़ा पिछले दो वर्षों में 60 लाख की बढ़ोतरी के साथ 25 करोड़ पर पहुंच गया है। 2023 में यूनेस्को द्वारा जारी ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट से पता चला है कि 2015 के बाद से प्राथमिक शिक्षा पूरी करने वाले बच्चों की संख्या में केवल तीन फीसदी का इजाफा हुआ है, जिसके बाद यह आंकड़ा 87 फीसदी पर पहुंच गया है। इसी तरह माध्यमिक शिक्षा पूरी करने वाले युवाओं के आंकड़े में केवल पांच फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसके बाद यह आंकड़ा बढक़र 58 फीसदी पर ही पहुंचा है। यूनेस्को के महानिदेशक ने सभी राष्ट्रों से त्वरित कार्रवाई का आह्वान करते हुए कहा है कि, ‘लाखों बच्चों का भविष्य आपके हाथों में है।’ संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि स्कूलों से बाहर रहने वाले बच्चों के आंकड़े में हुई इस बढ़ोतरी के लिए मुख्य रूप से अफगानिस्तान में महिलाओं व बच्चियों को शिक्षा से वंचित रखे जाने का बहुत बड़ा हाथ है। मगर इस बढ़ोतरी के लिए कहीं न कहीं दुनिया भर में शिक्षा की उपलब्धता में आया व्यापक ठहराव भी जिम्मेवार है। अपने यहां आज भी एक अनुमान के मुताबिक 15 करोड़ बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित हैं।आजादी के 75 साल बाद 80 प्रतिशत आबादी साक्षर हो चुकी है, लेकिन अभी भी 20 फीसदी यानी 25 करोड़ के आसपास लोग निरक्षर हैं। पूरी दुनिया में बच्चों की शिक्षा को महत्व दिया जाता है। इसके बावजूद विश्व भर में शिक्षा के विकास के लिए दी जा रही मदद का केवल एक फीसदी से भी कम हिस्सा प्री-प्राइमरी एजुकेशन के लिए दिया जा रहा है। यदि इस लिहाज से देखें तो हर बच्चे की प्री-प्राइमरी एजुकेशन पर हर वर्ष करीब 25 रुपए की मदद दी जा रही है। ऐसे में दुनिया भर में प्री-प्राइमरी एजुकेशन की क्या स्थिति होगी, इसका अंदाजा आप खुद ही लगा सकते हैं। यही वजह है कि गरीब और कमजोर तबके से संबंध रखने वाले करीब 80 फीसदी बच्चे आज भी प्री-प्राइमरी एजुकेशन से वंचित हैं। इस मुद्दे पर हमें भी आत्म दर्शन की जरूरत है। बेहतर हो कि सभी राज्यों में बुनियादी स्कूली शिक्षा से वंचित बच्चों की पहचान की जाए और उन्हें शिक्षा के लूप में शामिल करने के लिए कदम उठाए जाएं। हमारे स्कूलों में ही इतनी खामियां हैं कि बच्चे मनोवैज्ञानिक रूप से स्कूल में टिक ही नहीं पाते। खास तौर पर ग्रामीण भारत के सुदूर अंचल विशेष रूप से प्रभावित होते हैं, जहां एक तो अच्छे स्कूल नहीं हैं और अगर हैं भी तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षक नहीं हैं। इन स्कूलों में शिक्षकों की संख्या इतनी कम है कि स्कूल तो 1-2 शिक्षकों के भरोसे हैं, ऐसे में अब अध्यापक स्कूल व्यवस्था को देखे या पठन-पाठन को। आज सभी बच्चों को स्कूली शिक्षा उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है। इसके लिए सरकारों को आक्रामक तरीके से काम करना होगा और शिक्षा को लेकर राजनीतिक बयानबाजी से बचना होगा। 

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