तीसरी अर्थव्यवस्था में शामिल हो भी जाए तो क्या!
- रीमा यादव
 विगत 23 जुलाई को दिल्ली स्थित 'भारत मंडपम' का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने वक्तव्य में कहा कि 'भारत विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था में शामिल होगा। भारत समूचे देश- दुनिया में एक सशक्त राष्ट्र के रूप में उभरेगा' वहीं देखा जाए तो आगामी वर्ष अर्थात 2024 में लोकसभा का चुनाव होना प्रस्तावित है। कहीं यह बयान मात्र राजनीतिक तो नहीं ? एक जागरूक नागरिक होने के नाते इस मुद्दे पर विचार करना व इसके तह तक जाकर संभावनाओं व सीमाओं का पता लगाना लाज़िमी है।
एक रिपोर्ट के हवाले से देखें तो अमेरिकी निवेशक बैंक 'मॉर्गन स्टेनली' के अनुसार 2027 तक जापान और जर्मनी जैसे देशों को छोड़कर भारत दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था के पायदान पर होगा। वहीं अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF ) का अनुमान है कि 2027 तक भारत की जीडीपी 5 .4 ट्रिलियन डॉलर हो जायेगी। निश्चित ही यह भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी | वैश्विक महामारी कोविड -19 का जटिलतम दौर , गतिमान रूस - यूक्रेन यद्ध और यूरोपीय अमेरिकी बाजारों में आई मंदी से विश्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के बावजूद भी भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने जा रहा है।



प्रतिकूल परिस्थितियों में भारत की यह उपलब्धि गौर करने योग्य है। इन उपलब्धियों के साथ - साथ देश की सामाजिक, आर्थिक ,राजनैतिक एवं सांस्कृतिक आदि विभिन्न क्षेत्र की मूल समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सरकार की तरफ़ से भी इन क्षेत्रों पर किए गए कार्य और प्रयास अभी नाकाफी ही है।
खैर, जीडीपी किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के विकास को मापने की एक प्रणाली होती है। अर्थव्यवस्था के अहम संकेतक के रूप में जीडीपी को शामिल किया जाता है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या जीडीपी इन समग्र मुद्दों को अपने मापन की कसौटी में माप रही है ? जीडीपी पूरे मूल्य की तुलना में आर्थिक विकास या प्रति व्यक्ति आय पर अधिक ध्यान केंद्रित करती है। अमेरिकी सीनेटर रॉबर्ट कैनडी ने कहा था कि "जीडीपी उन चीजों को छोड़कर हर चीज को मापता है जो जीवन को सार्थक बनाती है|" जीडीपी किसी भी अर्थव्यवस्था के किसी एक पहलू में विकास कर सकता है; समूचे क्षेत्र में नहीं। यानी जीडीपी विकास का सूचक ज़रूर है पर समग्र विकास का नहीं। आज भी देश स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रदूषण, गरीबी, बेरोजगारी जैसे अहम मुद्दों से जूझ रहा है। इस ग्लोबल दौर में भी गरीब, गरीब होता जा रहा है और अमीर, अमीर। इस विषमता की खाई को पाटना और मुश्किल होता जा रहा है।
हाल ही में  वर्ल्डवाइड और वेल्टहंगर हिल्स द्वारा संयुक्त रूप से जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत भूख के मामले में 121 देशों में 107वें स्थान पर है। हेरिटेज फाउंडेशन द्वारा जारी आर्थिक स्वतंत्रता में भारत 176 देशों में 131वें स्थान पर। लैंगिक समानता में 127वें स्थान पर, ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी भ्रष्टाचार के मामले में 107 देशों में 86वें स्थान पर है।
 वहीं महिलाओं के संवेदनशील मामलों में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में इधर तीन वर्षों में 13.3 लाख से अधिक लड़कियां व महिलाएं लापता हुई हैं। और अभी हाल ही में समस्त मानवीय संवेदनाओं को तार - तार करने वाली मणिपुर की वीभत्स घटना को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। आए दिन नफ़रत हिंसा, अपराध , बलात्कार, व साम्प्रदायिक घटनाओं का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। आज भी अत्यंत पिछड़े व गरीब तबके के इलाकों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ना एक चुनौती है। जारी तमाम शिक्षा - अभियान के बावजूद भारत की अनेक ऐसी मलिन बस्तियां हैं जहां के बच्चें मूल शिक्षा से अभी कोसों दूर हैं। अनेक ऐसी बस्तियां हैं जहां के लोग कुपोषण के शिकार हैं।
इन तमाम खामियों को नजरअंदाज कर राजनैतिक वक्तव्यों का सहारा लेकर भारत का उत्थान व समूचा विकास कर पाना क्या संभव है? बतौर नागरिक भारत को दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा पर गर्व महसूस किया जा सकता है| पर स्मरण रहे केवल अर्थव्यवस्था की उन्नति देश की संपूर्ण उन्नति नहीं है| देश के समग्र विकास के लिए ज़रूरी है बढ़ते आर्थिक ग्राफ के साथ -साथ देश के नागरिकों में मानवता,  इंसानियत एवं समस्त नैतिक मूल्यों का भी ग्राफ बढ़े तभी देश की उन्नति है, केवल तीसरी अर्थव्यवस्था में शामिल हो जाने भर से नहीं।
(शोधार्थी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय)

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