पाकः संकट में अमन
पूर्व पीएम इमरान खान की पहले गिरफ्तारी और फिर सुप्रीम कोर्ट से रिहाई तक का पूरा घटनाक्रम पाकिस्तान की नई तस्वीर पेश करता है। दरअसल इसकी कड़ी बीते वर्ष अप्रैल में सेना ने पूर्व नियोजित पटकथा से जुड़ती है जब अविश्वास प्रस्ताव के जरिये इमरान खान की सरकार को गिराकर अपनी सुविधा के राजनीतिक गठबंधन को सत्ता की बागडोर सौंप दी थी। दरअसल, खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख पद पर अपनी पसंद के जनरल की नियुक्त के मसले पर सेना प्रमुख से हुए टकराव के बाद सेना इमरान खान के खिलाफ हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अप्रत्याशित ढंग से कई बार राहत देने के बाद हाईकोर्ट के जरिये एक कथित भ्रष्टाचार के मामले में इमरान खान की नौ मई को गिरफ्तारी की गई। लेकिन गिरफ्तारी के दौरान इमरान खान के साथ जिस तरह हिंसक व्यवहार किया गया, वह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा। दरअसल, दबंग नेता व पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान सेना की निरंकुशता के खिलाफ लगातार मुखर थे। तभी आठ मई को उनके द्वारा सेना के खिलाफ दिये गये बयान के बाद उनकी गिरफ्तारी की पटकथा लिखी गई और अगले दिन ही गिरफ्तार कर लिया गया। वैसे इमरान खान को भी आशंका थी कि उन्हें गिरफ्तार किया जायेगा। तभी उन्होंने एक वीडियो के जरिये अपने समर्थकों को उद्वेलित कर दिया था। जिस तरह लगातार उनके खिलाफ विभिन्न मामलों में मुकदमे दर्ज किये जा रहे थे, उसे देखकर तय था कि उनकी गिरफ्तारी की तैयारियां कर ली गई हैं। तभी उनकी गिरफ्तारी के बाद पूरे पाकिस्तान में उबाल है। हिंसा-आगजनी से पूरे पाकिस्तान में अराजकता की स्थिति है। लेकिन न्यायालय परिसर में इमरान की गिरफ्तारी के बाद न्यायपालिका में भी आक्रोश व्याप्त है, जो कालांतर सत्ता और न्यायपालिका के बीच टकराव की वजह बन सकती है। ऐसे वक्त में जब पाक में इमरान खान की लोकप्रियता उफान पर है, टकराव का सिलसिला लंबा चल सकता है। निस्संदेह, फिलहाल पाक में इमरान खान व उनकी पार्टी पीटीआई की लोकप्रियता चरम पर है। जिसके चलते पाक की सत्ता पर काबिज गठबंधन और सेना चाहती है कि किसी तरह इमरान खान को चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य ठहराया जाये। सत्ता व उसके अन्य प्रतिष्ठानों में गहरा दखल रखने वाली सेना कभी नहीं चाहती कि पाक में कोई लोकतांत्रिक ढंग से चुना कद्दावर नेता सत्ता पर आसीन हो। ऐसा होने से सेना के निरंकुश व्यवहार पर आंच आती है। तभी जल्दी आम चुनाव कराने के लिये आंदोलनरत इमरान खान को दागी करार देकर सत्ता से बाहर रखने का प्रपंच किया गया। कोशिश है कि सेना की सुविधा के अनुसार सरकार का गठन पाकिस्तान में किया जाये। यह विडंबना ही है कि विभाजन के साथ ही अस्तित्व में आये भारत में जहां अमृतकाल का उत्सव जारी है और लोकतंत्र फल-फूल रहा है, वहीं पाकिस्तान में बार-बार लोकतंत्र का गला घोटा जा रहा है।


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