परंपरागत खेती को छोड़ चकौरी अपना रहे किसान
-खरीदार कंपनी से पहले से ही भाव तय कर लेते हैं किसान
-छतारी क्षेत्र में लगातार बढ़ ही चकौरी की खेती करने वालो की संख्या
बुलंदशहर । किसानों को परंपरागत फसलों में कड़ी महेनत करने बाद भी मुनाफा नहीं मिल पा रहा हैं। जिससे किसानों का गैर परंपरागत फसलों की और रुझान बढ़ गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जनपद बुलंदशहर के छतारी क्षेत्र में किसान परंपरागत फसलों को छोड़कर चकौरी की फसल में कम लागत लगाकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। किसान बीज खरीद के दौरान ही चकौरी की बिक्री का भाव कंपनियों से तय कर लेते हैं। जिससे किसानों को कोई नुकसान भी नही होता।
बुलंदशहर के छतारी क्षेत्र के किसानों परंपरागत फसल गेहूं, जौ, जई आदि के उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। जिससे किसानों दिनों-दिन किसानों का परंपरागत फसलों से मोहभंग होता जा रहा है। यहीं कारण हैं कि किसानों ने गैर गैर परंपरागत फसलों की तरफ रुझान बढ़ाना शुरू किया। शुरूआत में कई फसलों की पैदावार करके किसानों ने देखी, लेकिन लाभ नहीं हुआ। जिस पर उन्होंने चकौरी की खेती को अपनाया, तो उसमें उसे मुनाफा हुआ। जिसके बाद छतारी के गांव डिरौरा-विश्वनाथपुर, जयरामपुर, समसपुर, छतारी, चैगानपुर, अल्लीपुर, बिकूपुर, कीतरपुर, रामनगर, पंडराबल, शेखूपुर, नरायनपुर, चौढेरा समेत दर्जनों गांव के सैकड़ों किसानों ने परंपरागत फसलों को छोड़ हजारों बीघा खेत में चकौरी की फसल पैदा करना शुरू कर दिया। इस फसल की खास बात यह हैं कि किसान चकौरी का बीज खरीदने के दौरान ही कंपनी से विक्रय के मूल्य निश्चित कर लेते हैं। जिससे बुवाई से पूर्व में ही किसान अपने खर्चे का हिसाब लगा लेते हैं। इतना ही नहीं इस फसल को बारिश, ओले से ज्यादा नुकसान नहीं होता है। क्योंकि यह शकरकंद की तरह जमीन में पैदा होती है। साथ ही जंगली जानवर भी इसे नुकसान नही पहुंचाते। बुवाई के बाद किसानों को महज पानी लगाकर नराई कराना और खाद लगाना बाकी रह जाता है और मेहनत भी कम है। किसान नरदेव शर्मा ने बताया कि गेहूं-जौ की फसल की अपेक्षा चकौरी की फसल कम लागत में अच्छा मुनाफ दे रहीं है। बिकूपुर निवासी कंछी सिंह के पास सात एकड़ जमीन है और वो अपनी जमीन के साथ-साथ पट्टे पर जमीन लेकर चकौरी की खेती करते हैं। वो कहला हैं कि आलू की खेती में जोखिम रहता था, लेकिन चकौरी में ऐसा बिल्कुल नहीं है।
नबंवर माह में होती हैं चकौरी की बुवाई:
चकौरी की बुवाई नबंवर महीने में होती है। खेत की जुताई करके उसमें 50 किलों प्रति एकड़ खाद और 10 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से पोटाश डालकर खेत तैयार किया जाता है। जिसके बाद खेत में हल्का पानी भर दिया जाता है। एक एकड़ भूमि में 500 ग्राम बीज बोया जाता है। चकौरी की फसल में समय-समय पर पानी लगाकर निराई की जाती है। साथ ही केवल एक बार प्रति एकड़ 25 किलो यूरिया लगना होता है।
बुवाई के दौरान होता हैं विक्रय मूल्य निश्चित:
गांव बिकूपुर निवासी किसान कंछी सिंह ने बताया चकौरी के बीज प्राप्त करने, फसल तैयार होने पर उसे बेचने और उसके विक्रय मूल्य को लेकर किसान बिल्कुल निश्चित रहता है। क्योंकि किसानों को चकौरी की बुवाई के समय ही बता दिया जाता है कि इस बार चकौरी किसान से कितने रुपए में खरीदी जाएगी। किसानों को चकौरी के बीज हिंदुस्तान लीवर कंपनी से मिल जाते है और फल तैयार होने पर वहीं खरीद भी लेती है। इस वर्ष फसल का मूल्य 300 रुपए प्रति कुंतल निर्धारित किया गया है।
छह माह में फसल तैयार, पानी की भी बचत:
चकौरी की फसल छह माह में तैयार हो जाती है। हालांकि इस फसल को अन्य परंपरागत फसलों से तैयार होने में थोड़ा अधिक समय लगता है। वहीं दूसरी तरफ फसल में पानी भी कम लगता है। अगर अधिकांश किसान इस फसल को करने लगे, तो लगातार गिर रहे जलस्तर को रोका जा सकता है।
काॅफी पाउडर में प्रयोग होती हैं चकौरी:
शकरकंद की तरह चकौरी की जड़ों को निकाला जाता है। जिन्हें किसान एकत्रित करके कंपनी को बेच देते है। जहां पर जड़ों को सूखाया जाता है। उसके बाद उन्हें मशीनों द्वारा भूनकर काॅफी पाउडर तैयार किया जाता है।


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