ललित गर्ग-
जीवन का अन्दाज है-जो था, जो है, जो होगा, बस, सबकी संयोजना, संकल्पना, व्यवस्था के बदलाव का ही एक नाम है- नया जीवन, नया वर्ष और नयी शुरूआत। बीते कल के अनुभव और आज के संकल्प से भविष्य को रचें। तभी सार्थक होगा नएवर्ष की अगवानी का यह पल-यह अवसर। नए साल की शुरूआत पर कुछ नया सोचें, नया लिखें, नया करें, नया कहें और नया रचें। प्रश्न है नया हो क्या? क्या कलेण्डर बदल देना ही नयापन है? पर मूल में तो सबकुछ कल भी वही था, आज भी वही है और कल भी वही होगा। अपेक्षा है अपने नजरिये को सकारात्मक बनाने की।
अपेक्षा एक ऐसा शब्द है, जो हममें आने वाले बदलावों के साथ-साथ बदलता रहता है। अपनी अपेक्षाओं को पूरा करने का सबसे पहला और सबसे बड़ा रहस्य यही है कि आप इस तथ्य को आत्मसात कर लें कि आप जो बचपन या किशारोवस्था में होते हैं, वही युवावस्था या बुढ़ापे में नहीं होते, यह बात तो स्पष्ट है। यहां तक कि जो आप कुछ घंटों पहले थे, उसमें भी बदलाव आ चुका होता है। आपके हर एक दिन ने आपको गढ़ा है, आपके व्यक्तित्व को आकार दिया है।
अपने व्यक्तित्व को सर्वांगीण आकार देने के संकल्प के साथ नए वर्ष का स्वागत हम इस सोच और संकल्प के साथ करें कि हमें कुछ नया करना है, नया बनना है, नये पदचिह्न स्थापित करने हैं। बीते वर्ष की कमियों पर नजर रखते हुए उन्हें दोहराने की भूल न करने का संकल्प लेना है। सबसे जरूरी है स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार। दुनिया में सबसे बड़ा आश्चर्य है अपने आपको नहीं जानना। आदमी अपने आपको नहीं जानता, अपने आपको नहीं देखता, यह सबसे बड़ा आश्चर्य है। यह प्रश्न महाभारतकाल में भी पूछा गया था-‘‘किमाश्चर्यमतः परम्।’’ दूसरों को जानने वाला आदमी अपने आपको नहीं जानता, दूसरों को देखने वाला स्वयं को नहीं देखता, क्या यह कम आश्चर्य है? प्रसिद्ध लोकोक्ति है कि अपनी बुद्धि से साधु होना अच्छा, पराई बुद्धि से राजा होना अच्छा नहीं। हजारों-हजारों मीलों की दूरी पर होने वाली घटनाओं और परिवर्तनों को जानने वाला आदमी अपने भीतर घटित होने वाली घटनाओं और परिवर्तनों को नहीं जानता, क्या यह कम आश्चर्य है? बहुत बड़ा आश्चर्य है। इसी सन्दर्भ में महान् दार्शनिक गेटे का कथन है कि यदि बात तुम्हारे हृदय से उत्पन्न नहीं हुई है तो तुम दूसरों के हृदय को कदापि प्रसन्न नहीं कर सकते।
नय वर्ष की अगवानी में सबसे कठिन काम है- दिशा-परिवर्तन। दिशा को बदलना बड़ा काम हैं लेकिन आदमी दिशा नहीं बदलता, दिशा वही की वही बनी रहती है। आदमी एक ही दिशा में चलते-चलते थक जाता है, ऊब जाता है। किन्तु दिशा बदले बिना परिवर्तन घटित नहीं होता। एमर्सन का कहा हुआ है वे विजय कर सकते हैं, जिन्हें विश्वास है कि वे कर सकते हैं। यदि जीवन की दिशा बदल जाती है तो सब कुछ बदल जाता है। जीवन की दिशा बदलती है अपने आपको जानने और देखने से। महान् क्रांतिकारी श्री सुभाषचन्द बोस का मार्मिक कथन है कि जिस व्यक्ति के हृदय में संगीत का स्पंदन नहीं है, वह चिंतन और कर्म द्वारा कदापि महान नहीं बन सकता।
स्वयं से स्वयं के संवाद न होने के कारण ही बुराइयों का चक्र चलता रहता है। वह कभी नहीं रुकता। आदमी बुराई करता है, पाप का आचरण करता है। प्रश्न होता है, वह पाप का आचरण क्यों करता है? श्रीकृष्ण ने इसका जो उत्तर दिया वह आज भी उतना ही मूल्यवान है, जितना वह उस समय मूल्यवान था। उन्होंने कहा-आदमी को पाप में धकेलने वाले वे शत्रु हैं-काम और क्रोध। क्रोध ज्ञान पर पर्दा डालता है। ऐसी माया पैदा करता है कि आदमी समझ ही नहीं पाता कि वह पाप कर रहा है, आदमी में गहरी मूर्च्छा और मूढ़ता पैदा हो जाती है और तब वह जानता हुआ भी नहीं जानता, देखता हुआ भी नहीं देखता। उसमें बुरे और भले का विवेक ही समाप्त हो जाता है और तब वह न करने योग्य कार्य भी कर लेता है। शेख सादी भी हमें स्वयं से स्वयं या स्वयं को परमात्मा से जोड़ने की सलाह देते हैं कि परमेश्वर देखता है और छुपाता है। पड़ोसी अपनी आंखों से देखता नहीं, तो भी चिल्लाता है।
अक्सर दुःशासन, दुर्योधन, जरासंध, कंस का योग मिले तब भी हंसना और युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, कृष्ण का योग मिले तब भी मुस्कुराना। यानी सुख-दुख में सम रहना। नये वर्ष में कुछ ऐसी ही सोच के साथ आगे बढ़ने के लिये संकल्पित हो।
जीवन की सार्थकता सदा मुस्कुराते रहने में ही है और इसी से नयावर्ष सराबोर बने, ऐसा प्रयत्न करना चाहिए। हम स्वयं अपने भाग्य के कर्त्ता-धर्ता हैं, सुख-दुःख के कर्ता-धर्ता हैं और हम स्वयं अपने नियंता- निर्माता है। कोई दूसरा कर्त्ता नहीं है। कोई दूसरा नियंता नहीं है। भगवान महावीर के अनुसार हम स्वयं अपने भाग्य के विधाता है। हमारे भाग्य का विधाता कोई दूसरा नहीं है। हमारे भाग्य की बागडोर हमारे ही हाथ में है।
जीवन को सफल बनाने के लिये यह आवश्यक है कि आप स्थिति का सही विश्लेषण करके, उसके संदर्भ में सही पृष्ठभूमि बनाएं। हम जो भी महत्वपूर्ण निर्णय करने जा रहे हैं, यदि उनके संदर्भ में हमें पृष्ठभूमि की सही जानकारी नहीं है तो हमारे कार्य करने की दिशा गलत हो सकती है। जिन्दगी को एक ढर्रे में नहीं, बल्कि स्वतंत्र पहचान के साथ जीना चाहिए। जब तक जिंदगी है, जिंदादिली के साथ जीना जरूरी है। बिना उत्साह के जिंदगी मौत से पहले मर जाने के समान है। उत्साह और इच्छा व्यक्ति को साधारण से असाधारण की तरफ ले जाती है। ‘जो आज तक नहीं हुआ वह आगे कभी नहीं होगा’ इस बूढ़े तर्क से बचकर नया प्रण जगायें। बिना किसी को मिटाये निर्माण की नई रेखाएं खींचें। यही साहसी सफर शक्ति, समय और श्रम को सार्थकता देगा।

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