- आरके सिन्हा
माता वैष्णो देवी मंदिर में नए साल की रात हुए दिल-दहलाने वाले हादसे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि हम भीड़ नियंत्रण करना नहीं सीखेंगे। अगर हमने पहले के हादसों से सीख ली होती तो देश को इतने भीषण हादसे को फिर देखना ना पड़ता। लेकिन हमने तो मानों सीखना छोड़ दिया है। माता के दरबार में माथा टेकने पहुंचे श्रद्धालुओं के बीच रात करीब 12:00 बजे अचानक जोर-जोर से जयकारे लगने लगे। उसके बाद धक्का-मुक्की और भगदड़ मच गई। भगदड़ ने भयानक रूप ले लिया। रात करीब दो बजे के आसपास हुए हादसे में 12 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई। वहीं, एक दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए। क्या स्थानीय प्रशासन को पता नहीं था कि माता के मंदिर में हर साल नए साल की रात को भक्तों की भारी भीड़ जुटती है? इसके चलते वहां भगदड़ की आशंका बन जाती है। लेकिन, लगता है कि इस तरफ देखा ही नहीं गया।
कैसे इतने सारे लोगों को एक साथ ऊपर मंदिर में जाने की अनुमति दे दी गई? हमें उन धार्मिक स्थानों और आयोजनों का मैनेजमेंट सीखना होगा जहां पर भारी भीड़ जुटती है। इन जगहों में जाने वालों को भी सतर्क होना पड़ेगा। इसके साथ यह भी देखना होता है कि किसी मेले या धार्मिक स्थान पर खास तिथियों पर ज्यादा भीड़ जमा न हो जाये क्योंकि भीड़ के किसी एक जगह जमा होते ही भगदड़ की आशंका भी बन जाती है। भीड़ की निकासी की हमेशा बेहतर और वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए। भक्तों को भी भीड़भाड़ वाले इलाकों से बचना चाहिए। वे अपनी लापरवाहियों की सारी जिम्मेदारी प्रशासन पर ही नहीं डाल सकते।
ओमिक्रोन का खतरा जब देश पर मंडरा रहा है तो इतने सारे भक्तों का वैष्णो देवी मंदिर में पहुंचना भी समझ से परे है। भीड़ के बेकाबू होने के कारण हादसे भारत में ही नहीं अन्य देशों में भी होते रहे हैं। कुछेक साल पहले मक्का में भगदड़ के कारण दुखद हादसा हुआ था। वहां सन 2004 और फिर सन 2006 में भी शैतान को मारने की होड़ में बड़े हादसे हुए हैं। अगर हम कुछ दशक पहले जाएं तो 1954 में प्रयागराज में कुंभ मेले में भारी भगदड़ मची थी। उसमें सैकड़ों लोगों की जान गई थी।
दुर्भाग्यवश कुछ शातिर किस्म के तत्व धार्मिक स्थलों की मर्यादा की अनदेखी करते हुए वहां घटिया हरकतें करने लगते हैं। पहली नजर में तो लगता है कि वैष्णो देवी मंदिर में भी यही हुआ। पता चला है कि रात दो बजे के बाद कुछ लोगों के बीच बहस हुई और उसके कारण धक्का-मुक्की की स्थिति पैदा हो गई। इसके बाद लोग भागने लगे, जिसके चलते हादसा हुआ। हालांकि पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों ने त्वरित प्रतिक्रिया दी तथा भीड़ में व्यवस्था तुरंत बहाल कर ली गई लेकिन उस वक्त तक नुकसान हो चुका था। इस तरह का दावा प्रशासन कर रहा है। पर उसने पहले ही स्थिति को बिगड़ने कैसे दिया।
वैष्णो देवी में हुए हादसे की बात करते हुए मुझे कहने दें कि यह वास्तव में बेहद चिंतनीय विषय है कि हमारे देश में धार्मिक स्थानों और पूजा समारोहों के दौरान नदी व तालाबों में नहाने या फिर मूर्ति विसर्जन करने के क्रम में भी दर्जनों लोग डूब कर जान गंवा देते हैं। कुछ साल पहले अकेले बिहार में छठ पूजा के दौरान डूबने से 73 लोगों की जान चली गई थी। दिल्ली में दुर्गा पूजा के विसर्जन के दौरान करीब 10 लोग डूबे थे। बेशक, ये सभी दिल दिहलाने वाली घटनाएं थीं। ये उन तमाम सरकारी दावों-वादों की पोल भी खोलते थे, जो संबंधित विभाग करते हैं कि “सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम कर लिए गए हैं।”
माफ करें, वैष्णो देवी मंदिर में हुए हादसे जैसी घटनाएं तो तब ही रुकेंगी जब हमारे प्रशासन की तैयारियां ठोस होंगी। वर्ना तो कुछ दिनों के शोर तथा मृतकों/घायलों के परिजनों को मुआवजा देने के बाद फिर से पहले की तरह सब कुछ चलने लगेगा। वैष्णो देवी का प्रबंधन देखने वाले अफसरों से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने 31 दिसंबर की किस तरह की तैयारियां की थीं। उन अफसरों पर चाबुक चले जो अपने दायित्वों का निर्वाह करने से चूक गए। इस घटना से सारे देश में शोक का माहौल व्याप्त हो गया है। दरअसल देश में वैष्णो देवी मंदिर को लेकर करोड़ों लोगों की अगाध आस्था है।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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