डॉ. ओपी चौधरी
भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही गॉवों का अस्तित्व था और वे किसी भी चीज की मांग और आपूर्ति के लिए एक -दूसरे पर निर्भर थे। दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश भारत है, इतनी बड़ी आबादी को भोजन देने का कार्य गांवों का ही है। बचपन की घटनाएं और बातें जो तब सहज भाव में घटी थी, आज वे स्मृतियों के रूप में गहन अचेतन में दफन हैं।



बचपन, किशोरावस्था, युवा, प्रौढ़ावस्था को पार कर जीवन के सांध्य बेला में आज जब लोग 2022 के आगमन की शुभकामनाएं देने में व्यस्त हैं। मेरा मन गॉव की पगडंडियों, खोरों और खेतों में विचरण कर रहा है- जीवन के अर्थ और मर्म की तलाश में। अपने पुरनियों की यादों में, उनकी बातों में, सब पीछे छूट चुके हैं। जब भी घर (गॉव) जाता हूँ उसी बचपन में पहुंचकर, बचपन के बाल सुलभ भाव- जिज्ञासा, सपनों और अरमानों को जिंदा पाकर उड़ अतीत में लौटने का, उसमें झांकने का, उसे जीने का।                                                                            
 लड़कपन और बचपन के दिन जब याद आते हैं तो ऊख की पताई, सरपत एवं बांस का कोरो, बडेरा, बाती-छनौती (अरहर की डंठल) से बने छप्पर की याद बरबस ही आ जाती है, जहां बिना कूलर, पंखा, एसी की ठंढी हवा कुदरत से मिलती थी। निखरहड़ (बिना बिस्तर) बसखटा खटिया पर हाथ की तकिया लगाकर सोने का जो आनंद और लुत्फ हमारी पीढ़ी ने उठाया है, उसकी कल्पना ही अब हमारे बच्चे कर सकते हैं। शाम को चूल्हा जलने पर चारों ओर धुंआ का उठना उस गांव की संपन्नता का द्योतक था। अब स्थिति ठीक इसके विपरीत है, धुंआ उठना पिछड़ेपन की निशानी है।
अब दुधनहर वाला लाल गाढ़ा दूध, ललकी साढ़ी वाली दही, गढ़की साढ़ी सहित मट्ठा, बटुली वाली गढ़की दाल, न हथरोटिया, भूजल आलू और गंजी, सब कुछ नदारद।विकास ने परंपराओं का विनाश कर डाला। तब कसेहरी का छप्पर संपन्नता का द्योतक था, उसमें 2-4 खाट या तखत पड़े रहना, घर की मर्यादा समझी जाती थी। अब टाइल्स का जमाना है। जमीन के ऊपर पॉव ही नहीं पड़ना है, वैसे हम जमीन से इतने ऊपर उठते गए कि अपना जमीर तक खो बैठे। अब पड़ोसी का दुःख हमें अपना दुःख नहीं लगता, बल्कि उसका सुख हमारे दुख का कारण है। ईर्ष्या का कारण है। खैर यह तो गंभीर बातें होने लगी।
मैं वापस ले चलता हूँ अपने गॉव मैनुद्दीनपुर, जलालपुर, अम्बेडकरनगर (यह कमोवेश सभी गांवों की बात है) जहाँ खुद्दी बाबा और मन्नू बाबा रहते थे, जिनकी आज याद आ गई और मैं अपने बचपन की यादों में खोता गया।कितने सच्चे और अच्छे लोग वे थे। नोहर काका, ओरी काका, छोटकुन बाबा, हेमराज दादा, रामदेव बाबा, हीरा माई, झुलुरा माई, नैकीना माई और हमारी सबसे प्रिय करियई कुसुमी काकी किसका गिनाऊँ किसका छोडूं। लक्खो बूढ़ी, दिल्लाजी फुआ, झिनका फुआ सभी से कितना अपनत्व, स्नेह और नेह। सभी का कितना लिहाज। इन लोगों में कोई छल कपट नहीं था, बेबाक बोलते थे।बस अब सब यादें ही रह गईं।
मुंशी प्रेमचंद जी ने ठीक ही लिखा है कि अतीत की स्मृतियां बहुत ही सुखद होती हैं जैसी भी रही हों। लेकिन यह हमारी थाती हैं। मुझे यह कहने में जरा भी गुरेज नहीं है कि तब समाज में छुआ-छूत की भावना व्याप्त थी, लेकिन अपनत्व था एक दूसरे के सुख-दुख के साथी थे। अब साथ में खान-पान हो गया लेकिन दिलों में दूरी हो गयी। सामाजिक ताना-बाना छिन्न -भिन्न हो गया। सभी एक व्यक्ति और एक मानव मात्र न रहकर एक जाति, धर्म, सम्प्रदाय के हो गए। जब भी किसी के घर बच्चा पैदा होता था, तो उस समय स्त्री रोग विशेषज्ञ, नर्स, मिडवाइफ, नर्स सभी की भूमिका में हीरा माई, बुधना माई आदि ही हुआ करती थीं। सोहर गाने गॉव और बगल के गॉव की महिलाएं आ जाती थी। जब भी बच्चे पैदा हुए- उनका पालन-पोषण माता-पिता के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्य भी मिलजुलकर करते थे।
प्रायः संयुक्त परिवार हुआ करते थे। दादी, बुआ, बड़ी मॉ, चाची कोई न कोई उन्हें गॉव में घुमा लाता था। बच्चों का समाजीकरण वहीं से शुरू हो जाता था।दूसरे बच्चों के साथ जब भी इनके अल्हड़पन को देखता हूँ और जो भी ये उस अल्हड़पन में निर्द्वन्द्व होकर मजे लेते हुए आनंदित होते हैं तो अपना भी मन आनंदित ही नहीं बल्कि आह्लादित होता है। लेकिन जो हम लोग बचपन  का जीवन जीये वह आज के बच्चे नहीं जी रहे हैं । चाहे शहर रहा हो या फिर गाँव, उस समय सब कुछ खुला-खुला था।
गाँव से लेकर शहर तक बड़े-बड़े खेलकूद के मैदान थे। उन मैदानों में छुट्टी के दिन सुबह से लेकर शामतक गुल्ली-डंडा, अखाड़ा, कबड्डी, लंगड़ी का खेल खेलते थे। खेलने-कूदने के बाद नदी या पोखरे में जाकर खूब मस्ती के साथ इस पार से उस पार तक तैर कर या डुबकी लगा कर मौज मस्ती करते थे। फिर घर का कोई मरकहवा सदस्य डंडा लेकर ढूंढता-फिरता था। जब भी हमलोग मिल जाते तो वह उस डंडे से खूब पिटाई करते थे, लेकिन दूसरे दिन फिर वही हरकत जैसे  "कुक्कुर क मार अढाई घरी"। सब कुछ भूल कर निकल जाते थे खेलने। कभी-कभी दूसरे गाँव के बगीचे में जाकर सुर्र खेलते थे। दूसरे के खेत से गन्ना तोड़ कर चूसते थे, मटर, चना का होरहा भूनते थे। कभी-कभी दूर बगीचे में जाकर सियरी अऊरी गोटी वाला खेल खेलते थे। चुहुलबाजी भी खूब करते थे । बूढ़े-बुढियों को चिढाने से लेकर उनकी कुबरी चुरा देना फिर उनकी आशीर्वाद स्वरूप गाली सुनकर आनंदित होने में जो मजा आता था उसका बयान शब्दों में नहीं किया जा सकता है।
छप्पर वाला घर, खपरैल वाला घर या ओसारी अब अधिकांश गांवों में दिखाई ही नहीं दे रहा है। न मिट्टी वाला बखार न मिट्टी वाले चूल्हे, न पीढा पर बैठकर, थाली में उचकुन लगाकर मंझेरिया में भोजन। न सजाव दही न गढका मट्ठा, न मोटकी लिट्टी-चोखा न हथरोटिया, न साढ़ी वाली दही न दुधनहर वाला औटल दूध, न दाल की खुद्दी वाली लेहसुन डाली लिट्टी ही, न ही दलफरा, सब कुछ नदारत।
 जब भी इन लोगों की याद आती है तब-तब अपने बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं । फिर  मैं गुनगुनाने लगता हूँ-'आ जा रे मेरे बचपन आ जा। बचपन के दिन भुला न देना, आज हॅसे कल रुला न देना। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी कृत्रिमता से ज्यादा मौलिकता और प्रकृति पर जोर देते थे। उनका कहना था कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। इसीलिए गाँधीजी गॉवों की दशा सुधारने के लिए योजनाओं के सृजन और क्रियान्वयन पर बल देते थे। काश कोई लौटा देता दिन बचपन के, मस्ती के, लड़कपन के, अल्हड़पन के, शरारतों के...!

- सह आचार्य एवं अध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणासी।

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