- शिवचरण चौहान

आदि काल से घरों में तुलसी का पौधा लगाने व उसके पूजने की परम्परा रही है। घर के आंगन में मिट्टी के एक घेरे में तुलसी का पौधा लगाना शुभ माना जाता है। महिलाएं वर्ष भर रोज शाम को तुलसी के पौधे की पूजा कर घी का दीपक जलाती हैं तथा कार्तिक मास में शुक्लपक्ष की द्वादशी (12) को तुलसी का भगवान सालिगराम से विधिवत विवाह रचाया जाता है। आज भी अधिकांश हिन्दू घरों में तुलसी के पौधे रोपे व पूजे जाते हैं। अब तो वैज्ञानिकों ने भी घरों में तुलसी के पौधे लगाए जाने को स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए अति उत्तम प्रयोग माना है।
तुलसी को हिन्दू घरों में आस्था का प्रतीक माना जाता है। तुलसी को सूखी लकड़ी के मनकों की माला बनाकर उसे जप आदि में प्रयोग किया जाता है।



हिन्दू घरों में तुलसी का पौधा, जन्म से लेकर मृत्यु तक काम आता है। तुलसी के पत्ते पंचामृत में डाले जाते हैं। मरते हुए व्यक्ति के मुख में गंगाजल व तुलसी के पत्ते डाले जाते हैं। अब तो तुलसी भारत ही नहीं विदेशों में भी पूज्य है। कई अमेरिकी कम्पनियां तुलसी के पौधे से निर्मित दवाइयों का पेटेण्ट कराना चाहती हैं। तुलसी को हम बड़े प्यार से तुलसी मां या तुलसा महारानी कहते हैं। कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वादशी को तुलसी घेरे (चौरे) को आकर्षक ढंग से सजाकर, तुलसी को दुल्हन की तरह सजाया-संवारा जाता है; फिर भगवान विष्णु के स्वरूप सालिगराम भगवान से उनका विवाह किया जाता है। बाद में तुलसी की आरती - "तुलसी महरानी नमो नमः हरि की पटरानी नमो नम:।।" करके पूजन किया जाता है।
तुलसी के अनेक नाम हैं हरिप्रिया, विष्णु बल्लभा, कृष्ण प्रिया, वृन्दा, सुरेज्या, रम्या, त्तित्राव, सुरभी, मंजरी आदि। पुराणों में कथा आती है कि समुद्र मंथन के समय लक्ष्मी जी निकलीं, जो भगवान विष्णु की भार्या बनीं। अमृतकलश लिए विष्णु से कुछ अमृत की बूंदें भूमि पर गिर गयीं तो एक सुन्दर युवती
में परिणिति हो गयी। इस युवती का नाम तुलसी रखा गया जो विष्णु की भार्या बनीं।
एक अन्य कथा के अनुसार तुलसी नाम की एक युवती भगवान विष्णु की परम उपासिका थी। उसने विष्णु की घोर तपस्या की और अंत में विष्णु को प्राप्त किया। बाद में तुलसी की स्मृति में एक पौधा उग आया, जिसे विष्णु प्रिया मानकर पूजा की जाती है। पंजाब में प्रचलित कथा के अनुसार बहुत पहले जलन्धर नाम का एक राक्षस था। जलन्धर की पत्नी का नाम वृन्दा था। वृन्दा परम भक्त थी। वह रात दिन भगवान विष्णु की पूजा में निमग्न रहती थी। भगवान विष्णु ने वृन्दा का उद्धार किया। मृत्यु के बाद वृन्दा नाम के पौधे की उत्पत्ति हुई। यही वृन्दा का नाम वृन्दावन पड़ा। तुलसी नाम पा जाने के कारण कविवर तुलसी तुलसीदास बनकर विख्यात हुए। आज कंकरीट के घरों में भी तुलसी का पौधा लोकप्रिय है। अमेरिका व ब्रिटेन में कुछ घरों में तुलसी पूजा होती है। तुलसी आस्था, आदर, भक्ति व संस्कृति का प्रतीक है।
सुबह-सुबह तुलसी के दर्शन से पुण्य प्राप्त होता है। पाप नष्ट होते हैं। वैज्ञानिकों ने ताजा निष्कर्षों में तुलसी के पौधे को मलेरिया व मच्छर विनाश का शक्तिशाली साधन माना है। तुलसी के पत्तियों के रस के सेवन से खांसी, मलेरिया रोग तो ठीक हो ही जाते हैं,कोरो ना भागने में भी तुलसी की चाय फायदेमंद पाई गई हैं।
कैंसर जैसे रोग में तुलसी की पत्तियों का रस रामबाग पाया गया है। सदियों से भारतीय, तुलसी की पत्तियों का काढ़ा बनाकर पीते रहे हैं। जुकाम, बुखार, मलेरिया, पेट दर्द, अपच में भी तुलसी का काढ़ा रामबाण औषधि है।
भारत में कृष्णा व श्वेत दो तरह की तुलसी के पौधे पाए जाते हैं। घरों, बागों, व मंदिरों में इन्हें देखा जा सकता है। जंगली तुलसी को बबई कहते हैं। तुलसी का वैज्ञानिक नाम आसीमुम साक्टुम है। अंग्रेजी में इसे सेक्रेड-बेसिल कहते हैं। इसके अलावा कपूर तुलसी से कपूर निकाला जाता है। कपूर के भी कई औषधीय गुण हैं। आयुर्वेद में भी तुलसी के गुण गाए गए हैं। कफ, पित्त, बात विकारों, व्रणों, फुन्सियों, दाद, कुष्ठ, दर्द में भी तुलसी निर्मित दवाएं लाभप्रद हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां टूथ पेस्ट, माउथवाश, डेंटल क्रीम में तो तुलसी का प्रयोग कर रही हैं। साथ ही तुलसी के तेल से खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने में प्रयोग किया जा रहा है।

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