- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
मैं भी बड़ा गजब आदमी हूँ साहब। थोड़ा कंप्यूटर, मोबाइल पर क्या काम कर लेता हूँ खुद को तोप समझने लगा हूँ। डिजिटल लेन-देन में जोमाटो-स्विगी खेलकर खुद को अंबानी-अडानी सा महसूस करने लगा हूँ। कलाई पर हेल्थ वाच पहनता हूँ। दिल की गति, रक्त का चाप और ऑक्सीजन का स्तर, पता लगाने का भ्रम पाल रखा हूँ। ऑक्सीजन की कमी से मरने वालों को जहाँ देश की सबसे बड़ी पंचायत सिरे से नकार देती है वहाँ ऐसे हेल्थ वाच का मेरी कलाई पर होना किसी हाथ के दाँत से कम नहीं है।
हाँ तो साहब मैं खुद को बड़ा एडवांस और हाई-फाई समझता हूँ। कल ही गली में एक कुत्ता चोट की पीड़ा के मारे रोता-बिलखता एक कोने में दुबका बैठा था। मैंने उसे पत्थर मारकर भगा दिया। गली में शांति फैल गई। खुद को गांधी सा महसूस करने लगा। अनजाने में भिखारी धक्का मार देता है तो मेरे भीतर का पुरुषत्व जाग उठता है। तुरंत उस पर पूरे बल के साथ अपना दमखन दिखाने लगता हूँ। जबकि शासक के रोज धक्के खाकर भी एक कोने में चुपचाप पड़ा रहता हूँ। उन पर भौंकता भी कैसे? चुनाव के समय उसी शासक को वोट डालने के बदले पूरे दो हजार रुपए जो लिये थे। दुनियाभर को समाज बदलने का भाषण झाड़ने वाला मैं, सड़क-चौराहे पर कचरा देख आँखें झेंप लेता हूँ। नाक पर रुमाल लगाकर आधुनिक बन जाता हूँ।
हाल ही में एक घटना घटी। किसी गाड़ी के टक्कर मार देने से एक आदमी लहूलुहान सड़क पर पड़ा रहा। मैं वीडियो बनाने में व्यस्त था। बाकी टाइम दुनिया भर के लोगों को फोन लगाता हूँ लेकिन ऐसे समय 108 के एमरजेंसी नंबर पर फोन लगाने को फजीहत समझने लगा। मुझे लगा कि कौन पड़ेगा इन सब झंझटों में। अब मुझे दुर्घटना देखने में मजा आने लगा है साहब। अलग-अलग तरह की दुर्घटनाएँ। अजीबोगरीब दुर्घटनाएं। इन सबसे मुझे व्यंग्य लिखने का मसाला जो मिल जाता है। इससे ज्यादा मुझे क्या चाहिए।
- (हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार से सम्मानित व्यंग्यकार)




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