- कौशल शर्मा

सुपारी सदियों से पूजा सामग्री और खाने के काम आती रही है। लेकिन सुपारी के खिलौने की बात सुनकर आश्चर्य-सा होता है। मध्य प्रदेश के रीवाँ शहर में कुंदेर परिवार के कुछ लोग सुपारियों के तरह तरह के खिलौने की कला में दक्षता हासिल किए हुए हैं। सुपारियों से बने सुंदर और मनमोहक खिलौने देखकर देशी विदेशी पर्यटक सभी आश्चर्य चकित हो जाते हैं। छोटी सी सुपारी को छील छील कर अगर एक टेबललैंप या ताजमहल बनाकर खड़ाकर दिया जाए तो वाकई दाँतों तले उँगली दबाने की बात ही होगी। सुपारी की यह हस्तकला कुंदेर परिवार में पुश्त दर पुश्त विकसित की गई है जो इनके कठिन श्रम और निरंतर अनुसंधान का फल है। पहले इन परिवारों में लकड़ी के खिलौने बनाने का काम होता था। बाद में सुपारी पर प्रयोग करते करते ये लोग सुपारी के खिलौने तैयार करने लगे।
सुपारी से खिलौने बनाने का प्रारंभ इन्होंने सिंदूर की डिब्बी बनाने से किया। सुंदर और कलात्मकता में विभिन्नता लिए सिंदूरदानी तैयार करते करते इन्होंने अन्य चीज़ें भी बनानी शुरू कर दीं। अन्य कलाकृतियों में मुख्य है टेबिल लैंप, बेड लैंप, घड़ी, ताजमहल, कुतुबमीनार, टी सेट, मंदिर, पंचमुखी मंदिर, पानदान, तोप, हिरन, हाथी, मोर, खरगोश, सभी देवताओं की मूर्तियाँ, शिवलिंग, पेन, कंगारू, सारस, पैडेंट, गेटवे ऑफ इंडिया आदि। ये हस्त शिल्पी ज्यादातर सामान आर्डर मिलने पर बनाते हैं और थोक माँग पर ये लोग रातदिन एक कर के कलाकृति तैयार करते हैं। इन खिलौनों की कीमत 10 रुपये से लेकर 5000 रुपये तक होती है। जिस कलाकृति में जितनी आधिक सुपारियाँ लगती हैं उसकी उतनी ही अधिक कीमत होती है।
सुपारी खिलौनों के रखरखाव हेतु यह ज़रूरी होता है कि इन्हें शीत और पानी से बचाया जाए। पानी इनका सबसे बड़ा दुश्मन होता है। बरसात के मौसम में इसमें घुन लगने का खतरा भी रहता है। इससे बचाव के लिए एक विशेष तरह की पालिश की जाती है। इन कारीगरों के दादा बाबा के ज़माने में बिजली नहीं थी। तो वे खराद मशीन को चलाने के लिए नेत्रहीन लोगों को काम पर रख लेते थे। जो हाथ से रस्सी खींचकर केवल खराद मशीन ही चलाते थे। लेकिन पर्याप्त बिजली उपलब्ध होने से ये स्वयं ही मशीन चलाकर सुपारी को खरादते हैं। इस हस्त कला के ज्यादा कारीगर नहीं होने के बावजूद यह कला भली भांति फल फूल रही है।
सुपारी के इस काम में जिन औज़ारों की इन्हें जरूरत पड़ती है उनमें प्रमुख हैं खराद मशीन और खराद मशीन में लगने वाला एक विशेष प्रकार का औजार कूंद। इसके अतिरिक्त रुखान, निहाना, फरेटी, बसूला, आरी, बर्मा, निहानिया, नागफनी, हथौड़ा, प्रकाल आदि। यहाँ यह बतलाना आवश्यक है कि कूंद नाम से ही इनके परिवार का नाम जुड़ा हुआ है। पुराने समय से ही इन लोगों के यहाँ प्रत्येक शुभ कार्य में कूँद द्वारा आग जलाकर शुभारंभ किया जाता है।

No comments:

Post a Comment

Popular Posts