आइए! रक्तदान करें और जीवन बचाएं

- कृष्ण कुमार निर्माण
करनाल, हरियाणा


भारतीय फिल्मों में लम्बे समय तक याद किए जाने वाले गीतकार इंदीवर का एक गीत है-
अपने लिए जिए तो क्या जिए।, तू जी ए दिल जमाने के लिए।।
मतलब अपने लिए जीना, जीना नहीं होता। ऐसा ही हमारी संस्कृति में भी है। हमारे विचारों में भी है, तभी तो हमारे यहाँ मानवमात्र के कल्याण के लिए हड्डियां तक दान में देने की परम्परा के उदाहरण हैं। आज हम रक्तदान की बात कर रहे हैं। एकदम सही कहा है युगद्रष्टा हरदेव सिंह जी ने कि- "मानव का रक्त नालियों में नहीं बल्कि नाड़ियों में बहना चाहिए"।



सम्भवतः इसी महावाक्य को ध्यान में रखते  विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा हर साल चौदह जून को "विश्व रक्तदान दिवस" मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने के पीछे मंशा यह है कि रक्त की ज़रूरत पड़ने पर उसके लिए किसी को पैसे देने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए, अभी तक विश्व के अनेक देशों ने इस पर अमल किया है।
रक्तदान के सम्बन्ध में चिकित्सा विज्ञान कहता है, कोई भी स्वस्थ्य व्यक्ति जिसकी उम्र अठारह से पचास साल के बीच हो, जो चालीस किलोग्राम से अधिक वजन का हो और जो एचआईवी, हेपाटिटिस बी, हेपाटिटिस सी जैसी कोई गम्भीर बीमारी न हुई हो,वह रक्तदान कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शत-प्रतिशत स्वैच्छिक रक्तदान नीति की कल्पना की है। संगठन ने यह लक्ष्य भी रखा है कि विश्व के तमाम देश अपने यहाँ स्वैच्छिक रक्तदान को ही बढ़ावा दें। इसका उद्देश्य यह था कि रक्त की ज़रूरत पड़ने पर उसके लिए किसी को भी पैसे देने की ज़रूरत न पड़े और रक्त की कमी के कारण किसी की जान न जाए, पर अभी तक भी कई देशों ने इस पर अमल नहीं किया है।
असल में 14 जून को कार्ल लेण्डस्टाइनर जो कि अपने समय के विख्यात ऑस्ट्रियाई शरीर विज्ञानी थे, उनके जन्मदिन के अवसर पर ये दिन तय किया गया है। शरीर विज्ञान में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिक को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने रक्त में अग्गुल्युटिनिन की मौजूदगी के आधार पर ए आर ओ रक्त का अलग-अलग वर्गीकरण कर दिया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के तहत भारत में सालाना एक करोड़ से ज्यादा यूनिट रक्त की ज़रूरत है लेकिन उपलब्ध पिचहत्तर लाख यूनिट ही हो पाता है। यानी क़रीब पच्चीस लाख यूनिट रक्त के अभाव में हर साल सैंकड़ों मरीज़ दम तोड़ देते हैं।
गजब की बात तो यह भी यह कि बेशक हमारी आबादी सवा अरब से ऊपर पहुँच गयी हो, लेकिन रक्तदाताओं का आंकड़ा कुल आबादी का दस प्रतिशत भी नहीं पहुंच पाया है। जबकि हमारे यहाँ रक्त की बहुत अधिक मात्रा में जरूरत होती है।असल में रक्तदान करना भी आज के युग में किसी को जीवनदान देना ही है, साथ ही अपने विचारों का फैलाव करना भी है।
इस संदर्भ में यह भी कह देना बेहद जरुरी है कि रक्तदान करने से शरीर में किसी भी प्रकार की कोई कमजोरी नहीं आती बल्कि निरन्तर रक्तदान करके हम बहुत सारी गम्भीर बीमारियों से बच सकते हैं।स्वयं लेखक भी कई बार रक्तदान कर चुके हैं। आइए! हम सब भी संकल्प लें कि जीवन में रक्तदान जरूर करेंगे बल्कि रक्तदान को जीवन का नियमित कर्म बानाएंगे।

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