- डा.जगदीश सिंह दीक्षित
प्रोफेसर (रिटा.) टीडी कालेज जौनपुर।



बुनियादी दवाओं की अनुपलब्धता भारत की ग्रामीण स्वास्थ्य देखभाल की एक सतत समस्या है। कई ग्रामीण अस्पतालों में नर्सों की संख्या जरूरत से काफी कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूदा स्वास्थ्य केंद्र अल्प-वित्तपोषित हैं, निम्न गुणवत्ता वाले उपकरणों का उपयोग करते हैं, दवाओं की आपूर्ति में कम हैं और योग्य और समर्पित मानव संसाधनों की कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर दवाएं उपलब्ध नहीं होती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी दवा की आपूर्ति अनियमित है।



पर्वतीय और वन क्षेत्रों में तो और ही बुरी स्थिति है।
आजादी के इतने दिनों बाद भी ये सभी क्षेत्र स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से अत्यंत ही खराब दौर से गुजर रहे हैं। न ही केन्द्र सरकारों ने और न ही राज्य सरकारों ने स्वास्थ्य सेवाओं का जितना विकास करना चाहिए था इस दिशा में कार्य नहीं किया। बिहार, बंगाल, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश की सारी पोल इस कोविड-19 के काल में खुल गयी। कहीं भवन जर्जर हैं तो कहीं उन भवनों में गाय, बैल बाँधे जाते हैं या फिर भूसा रखा गया है। भवन हैं तो डाक्टर नहीं। डाक्टर है तो वहां कोई सुविधाएं नहीं हैं। सब कुछ है तो डाक्टर साहब अस्पताल पर रहते ही नहीं।
ग्रामीण, वनीय एवं पर्वतीय क्षेत्रों में शायद ही किसी महिला डाक्टर की तैनाती होगी। अधिकांशतः इन सभी क्षेत्रों में स्थित अस्पतालों में पैथालॉजी या एक्स रे की व्यवस्था भी नहीं है। देश में एम्स जैसे अस्पतालों की भारी कमी है, जो नये एम्स बने तो वहाँ विशेषज्ञ चिकित्सकों का अभाव है। जब भी थोड़ी सी वर्षा होती है तो पटना के एम्स में पानी भर जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में एकाध जगह को छोड़ दिया जाए तो एम्स खुले ही नहीं।
वाराणसी से वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही प्रतिनिधित्व करते हैं। फिर भी सर सुन्दर लाल अस्पताल (बीएचयू) वाराणसी को आज तक जनता की प्रबल माँग के बावजूद भी एम्स का दर्जा नहीं मिला, जबकि इस अस्पताल पर बिहार का पश्चिमी एवं मध्यप्रदेश तथा झारखंड के कुछ क्षेत्रों के मरीजों का भारी दबाव रहता है। झारखंड एवं मध्यप्रदेश की सीमा जो उत्तर प्रदेश से सटी हुई है, बिहार का जो सासाराम एवं गया का इलाका है, उधर गोरखपुर, देवरिया से सटे जो बिहार का सीवान और छपरा क्षेत्र है इन सभी क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानों पर  सर्व सुविधा संपन्न बड़े अस्पतालों की जरूरत है।
ग्रामीण, वनीय एवं पर्वतीय क्षेत्रों में प्रथमतः जितने भी सामुदायिक, प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक व सहायक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं सभी को सर्व सुविधाओं से संपन्न बनाने के लिए युद्ध स्तर पर केन्द्र एवं राज्य सरकारों को काम करना होगा । इन सभी अस्पतालों पर पद सृजन करके एलोपैथिक, आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपैथिक चिकित्सकों की नियुक्ति करने के साथ-साथ सभी अस्पतालों पर महिला चिकित्सकों की भी नियुक्ति होनी चाहिए। पूरा पैरा मेडिकल स्टाफ एवं नर्सों की भी नियुक्ति होनी चाहिए। सभी केन्द्रों पर एक्स-रे एवं पैथालॉजी लैब भी होनी चाहिए। इन सभी अस्पतालों पर ही सभी चिकित्सकों एवं स्टाफ के रहने की तथा उनके बच्चों की अच्छी पढाई की भी व्यवस्था करनी पड़ेगी। तभी सभी लोग उन स्थानों पर रहेंगे। इन क्षेत्रों में काम करने वाले चिकित्सकों एवं कर्मचारियों को विशेष भत्ते भी दिए जाने चाहिए।अस्पताल सहित पूरे आवासीय परिसर को बिजली के साथ-साथ सौर्य ऊर्जा से युक्त करना होगा।
ऐसे में जो एक बात सामने उभर कर आती है,वह यह कि इन सभी क्षेत्रों में चिकित्सक हों या फिर कर्मचारी रहना नहीं चाहते हैं । चिकित्सकों को बान्ड भरवाने की जरूरत होगी कि आपको पाँच साल तक इन क्षेत्रों में कार्य करना ही होगा। इसी तरह का बान्ड कर्मचारियों से भी भरवाने की जरूरत होगी, क्योंकि तभी ये लोग इन स्थानों पर काम करने के लिए तैयार होंगे। इस सबके बाद जो सबसे जरूरी है वह यह कि- उन्हें पूरी सुरक्षा प्रदान करनी।
अब जो क्षेत्र स्वास्थ्य सुविधाओं से अभी तक वंचित हैं उन जगहों को चिन्हित करके नये अस्पताल स्थापित किया जाना चाहिए। कम से कम आगे आने वाले कुछ वर्षों में नये एम्स केन्द्र सरकार को खोलने चाहिए। सभी अस्पतालों पर पूरा आक्सीजन का प्लान्ट भी लगना चाहिए। अभी जिस तरह से वैज्ञानिकों की रिपोर्ट आ रही है कि कोविड-19 की तीसरी लहर भी आने की प्रबल संभावना है, जिसमें विशेषकर छोटे बच्चे प्रभावित होंगे। इसको ध्यान में रखते हुए मानसिक रूप से अपनी पूरी तैयारी करके रखनी होगी। फिर चूक हुई तो फिर स्थिति संभालने से भी नहीं संभलेगी।

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