मेरठ । विवि के इतिहास विभाग में चल रही दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शीर्षक के दूसर दिन प्रो सतीश चन्द्र सिंह, इतिहास विभाग, हेमवन्ती बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर, गढ़वाल ने कहा कि जब गाँधी को अफ्रीका में रेलगाड़ी से लात मारकर निकाल दिया गया था तब किसी ओर ने नहीं अपितु उन्होंने स्वयं से प्रश्न किया तथा समाज में सुधार करने की ठानी। आज गाँधीजी जहाँ पहुँचे हैं क्या वे बिना अपनी अर्द्धाग्नी के सहयोग से पहुँचे हैं। जब भी कोई पुरूष समाज में आगे निकलता है तो उसके पीछे हमेशा कोई स्त्री ही होती है चाहे वह किसी भी रूप में हो।
प्रो0 अजय विजय कौर, विभागाध्यक्ष ने कहा कि भारतीय स्त्रियों की प्रास्थिति में सकारात्मक सुधार के लिए डॉ अम्बेड़कर को श्रेय देते हुए कहा कि डॉ अम्बेडकर ने महिलाओं को समानता व स्वतन्त्रता के साथ पुत्री के रूप में सम्पत्ति की स्वामिनी होने का अधिकार व पत्नी के रूप में उत्पीड़न व शोषण किये जाने की दशा में तलाक का अधिकार प्रदान किया। डॉ अम्बेडकर को इन दो अधिकारों की स्थापना के लिए समाज का बहुत विरोध झेलना पड़ा पर वह अपने संकल्प पर अडिग रहे।
प्रो के के शर्मा, एमएम(पी0जी0) कॉलेज, मोदीनगर ने कहा कि महिला सशक्तिकरण की बात हमारे समाज में की जाती है वास्तव में इसकी आवश्यकता ही नही है। हमारे समाज में महिला पहले से ही सशक्त है। महिला सशक्तिकरण पाश्चात्य देशों का कार्यक्रम है इसकी वहाँ सही मायने में आवश्यकता है। भारतीय समाज में जब महत्वपूर्ण निर्णय लिये जाते हैं तो उनमें महिला का मत विशेष महत्व रखता है। इसके अभाव में निर्णय लिये जाने का प्रश्न ही नहीं उठता। राखीगढ़ी की खुदाई में जो कब्रिस्तान मिलें हैं उनमें स्त्रियों की कब्र को पुरूषों की कब्र की तुलना में अधिक स्थान दिया गया है। स्त्रियों की कब्र में रखे बर्तनों की संख्या पुरूषों की कब्र की तुलना में रखे बर्तनों से अधिक है। अत: हमारे समाज में हमारी प्राचीन सभ्यता के समय से ही स्त्रियों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रो वाई विमला, प्रति-कुलपति ने कहा कि हमारें समाज में पुरूषों की सोच समय के साथ बदल रही है वह गृह कार्य को स्त्री की ही जिम्मेदारी न मानकर, अपना सहयोग प्रदान कर रहे हैं। परिवर्तन संसार का नियम है, परिवर्तन सतत् रूप से जारी रहता है। आज के समय के लोगों में भी परिवर्तन आया है छोटी सी बात पर उग्र हो जाते हैं। यह सब इसलिए है कि व्यस्तता बहुत अधिक है। सविनय अवज्ञा आन्दोलन ने इस देश की धरती से जन्म लिया परन्तु आजकल होने वाले आन्दोलनों में विनय दिखाई नहीं पड़ता। आज का व्यक्ति चार दिन की जिन्दगी मानकर चलता है और उसे दो दिन में ही जीने की इच्छा रखता है ।


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