क्या सांसों की लय किशोरियों का अकेलापन कम कर सकती है?
174 किशोरियों पर हुए अध्ययन में सामने आया असर, ज्यादा प्रतिकूल अनुभव झेलने वाली लड़कियों में सामाजिक जुड़ाव की भावना में करीब आठ प्रतिशत सुधार
नई दिल्ली। किशोरावस्था में दोस्तों, सोशल मीडिया और लगातार बातचीत के बीच भी कई लड़कियां भीतर से बेहद अकेला महसूस करती हैं। पढ़ाई का दबाव, बदलते रिश्ते, साथियों का दबाव और परिवार से मिलने वाला भावनात्मक सहयोग कम होना इस अकेलेपन को बढ़ा सकता है। ऐसे में एक अध्ययन ने संकेत दिया है कि सांस लेने की एक संरचित तकनीक कुछ किशोरियों को तनाव से निपटने और दूसरों से जुड़ाव महसूस करने में मदद कर सकती है।
अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित दो हाईस्कूलों की 14 से 18 वर्ष आयु की 174 किशोरियों को अध्ययन में शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने सामाजिक-भावनात्मक प्रशिक्षण के साथ SKY Breath (सुदर्शन क्रिया योग) आधारित श्वसन अभ्यास को जोड़ा। उद्देश्य यह समझना था कि नियमित और लयबद्ध सांसों का अभ्यास भावनात्मक नियंत्रण, तनाव से निपटने की क्षमता और सामाजिक जुड़ाव पर कितना असर डाल सकता है।
अकेलापन सिर्फ दोस्तों की कमी नहीं
किशोर के आसपास कई दोस्त और परिचित हों, इसके बावजूद वह अकेलापन महसूस कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार असल समस्या हमेशा लोगों की कमी नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव की अनुभूति का अभाव हो सकती है। किशोरावस्था में यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2023 के एक अध्ययन में मध्य एशिया, यूरोप और कनाडा के करीब 2.8 लाख किशोरों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया था। इसमें 15 वर्ष की उम्र की लड़कियों में लड़कों की तुलना में बार-बार अकेलापन महसूस करने की दर अधिक पाई गई थी।
प्रतिकूल बचपन के अनुभवों का भी असर
बचपन में दुर्व्यवहार, उपेक्षा, बुलिंग, पारिवारिक कलह, किसी करीबी को खोना या अन्य तनावपूर्ण घटनाएं किशोरों के सामाजिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे अनुभवों की अधिकता वाले किशोरों में अकेलेपन और सामाजिक अलगाव की समस्या और गंभीर हो सकती है।
चार सप्ताह का प्रशिक्षण, फिर आठ सप्ताह अभ्यास
अध्ययन में शामिल किशोरियों को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह ने SKY Schools कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जबकि दूसरे समूह ने अपनी नियमित शारीरिक शिक्षा की कक्षाएं जारी रखीं।
पहले चार सप्ताह के कार्यक्रम में सामाजिक-भावनात्मक सीख, समूह गतिविधियां, संवाद, शारीरिक गतिविधियां, योग और SKY श्वसन अभ्यास शामिल थे। इसके बाद प्रतिभागियों ने आठ सप्ताह तक रोजाना सांसों का अभ्यास जारी रखा। इस तरह कुल 12 सप्ताह तक हस्तक्षेप किया गया।
जिनको सबसे ज्यादा जरूरत थी, उनमें ज्यादा सुधार
अध्ययन के परिणाम खास तौर पर उन किशोरियों के लिए महत्वपूर्ण रहे, जिन्होंने जीवन में अधिक प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना किया था। आठ सप्ताह बाद इस समूह में सामाजिक जुड़ाव के स्कोर में शुरुआती स्तर की तुलना में करीब आठ प्रतिशत सुधार दर्ज किया गया।
यूसीएलए के सेमेल इंस्टीट्यूट फॉर न्यूरोसाइंस एंड ह्यूमन बिहेवियर के शोध प्रोफेसर और अध्ययन के वरिष्ठ लेखक दारा घहरेमानी के अनुसार, सबसे अधिक चुनौतियों का सामना करने वाली लड़कियों में सबसे अधिक लाभ दिखाई देना अध्ययन का महत्वपूर्ण निष्कर्ष रहा।
सांस और मन के बीच गहरा संबंध
SKY कार्यक्रम से जुड़े गुरुदेव श्री श्री रविशंकर के अनुसार, “सांस शरीर और मन के बीच की कड़ी है।” तनाव या चिंता के दौरान सांस लेने का तरीका बदल जाता है। इसी तरह सचेत रूप से सांसों पर काम करने से तनाव के अनुभव को प्रभावित करने में मदद मिल सकती है।
मुंबई की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट नेहा सिंह भी अपने क्लिनिकल अनुभव के आधार पर ध्यान और सुदर्शन क्रिया जैसे अभ्यासों को भावनात्मक नियंत्रण तथा समग्र मानसिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी मानती हैं। उनके अनुसार, उन्होंने ऐसे किशोर मरीजों में भी लाभ देखा है, जिन्होंने कम समय में कई प्रतिकूल घटनाओं का सामना किया था।
कम लागत में स्कूलों तक पहुंचने की संभावना
अध्ययन ने इस दिशा में नई चर्चा शुरू की है कि सांसों के अभ्यास और सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा को स्कूल स्तर पर किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य सहयोग का हिस्सा बनाया जा सकता है। हालांकि ऐसे अभ्यासों को मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। गंभीर अकेलेपन, अवसाद, चिंता या आघात से जूझ रहे किशोरों को प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद भी जरूरी है।

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