इलमा अज़ीम
कभी भारतीय परिवार में बुजुर्ग घर की धुरी हुआ करते थे। संयुक्त परिवार में दादा-दादी, माता-पिता, बच्चे और अन्य सदस्य एक-दूसरे का सहारा बनकर रहते थे। उम्र बढऩे पर बुजुर्गों को यह चिंता नहीं रहती थी कि बीमारी या असहाय अवस्था में उनकी देखभाल कौन करेगा। परिवार ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा था। लेकिन आज संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवारों में बदल रहे हैं और इसके साथ ही देखभाल एक बड़ी सामाजिक चुनौती बनती जा रही है।
इसके लिए देश को अभी से एक पेशेवर दीर्घकालीन और व्यवस्थित देखभाल नीति बनाने की आवश्यकता है। आजकल बहुत से परिवारों में केवल एक संतान होती है। उच्च शिक्षा और रोजगार के लिए बच्चे दूसरे शहरों अथवा विदेशों में चले जाते हैं। निजी क्षेत्र में लंबे कार्य घंटे, बच्चों की शिक्षा और बेहतर भविष्य की तलाश उन्हें वहीं बसने के लिए विवश कर देती है और माता-पिता अपने पैतृक घर में अकेले रह जाते हैं। बच्चों के लिए बार-बार पैतृक घर आना-जाना संभव नहीं हो पाता।
परिणामस्वरूप बुजुर्ग अपने बच्चों की राह देखते रहते और धीरे-धीरे अकेलेपन, असुरक्षा और निर्भरता का जीवन जीने लगते हैं। कभी-कभी स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि विदेश में रहने वाले बच्चे माता-पिता की बीमारी के समय और कुछ मामलों में अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो पाते। यह केवल भावनात्मक पीड़ा का विषय नहीं है, बल्कि बदलती सामाजिक संरचना की एक गंभीर वास्तविकता है। पीढिय़ों के बीच बढ़ता विचारों का अंतर भी इस समस्या को जन्म देता है। कभी-कभी बच्चे अलग हो जाते हैं और पीछे रह गए बुजुर्गों की स्थिति अत्यंत कठिन हो जाती है।
ऐसे समय में उन्हें केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि साथ, सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा और नियमित देखभाल की आवश्यकता होती है। इस चुनौती का समाधान एक मजबूत देखभाल पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में है जिसमें परिवार, प्रशिक्षित देखभालकर्ता, अस्पताल, स्वास्थ्य सेवाएं, स्थानीय संस्थाएं, स्वयंसेवी संगठन और सरकार मिलकर काम करें। समय की मांग है कि भारत देखभाल को एक संगठित सामाजिक व्यवस्था और सम्मानजनक व्यवसाय का स्वरूप दे।




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