बीमार मानसिकता
 इलमा अज़ीम 

हाल ही में उत्तराखंड में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ हुई घटना को लेकर राजनीति चाहे जितनी की जाए, लेकिन इस तरह की घटनाओं को कभी भी स्थान नहीं दिया जा सकता। दरअसल इस तरह की घटनाओं की पीड़ा का अहसास उस हर भारतीय को होना चाहिए जो समता और न्याय के आदर्शों में विश्वास करता है, जो यह मानता है कि हमारा संविधान देश के हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है। राजनीतिक स्वतंत्रता हमने लगभग अस्सी साल पहले प्राप्त कर ली थी, पर अधूरी है यह स्वतंत्रता।

 आवश्यकता सामाजिक रूढ़ियों से उबरकर एक ऐसे समाज को स्वतंत्र बनाने की है जहां व्यक्ति की नाप-तौल उसकी धार्मिक पहचान और उसकी जाति के आधार पर न हो। इस संदर्भ में हमारे संविधान के प्रमुख शिल्पी डॉक्टर बी.आर. अम्बेडकर का वह संबोधन याद रखने की आवश्यकता है जो उन्होंने संविधान-सभा की आखिरी बैठक में दिया था। 

अपने उस ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने कहा था, ‘26 जनवरी, 1950 को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बन जाएगा, पर उसकी स्वतंत्रता का क्या होगा? वह अपनी स्वतंत्रता फिर से खो तो नहीं देगा?’ इसी भाषण में उन्होंने यह भी आगाह किया था कि उन्हें जाति और वर्ण जैसे देश के पुराने शत्रुओं की भी चिंता है। उन्होंने कहा था, ‘हमें राजनीतिक जनतंत्र से ही संतुष्ट नहीं हो जाना, हमें इसे सामाजिक जनतंत्र भी बनाना होगा। बिना सामाजिक जनतंत्र के आधार के राजनीतिक जनतंत्र नहीं बन सकता। 

सामाजिक जनतंत्र का मतलब है एक ऐसी जीवन-पद्धति जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में स्वीकारती है। ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन्हें एक-दूसरे से पृथक करने का मतलब जनतंत्र के उद्देश्य को ही समाप्त करना होगा... समानता नहीं होगी तो इसका मतलब बहुतों पर कुछ का आधिपत्य होगा और समानता बिना स्वतंत्रता के व्यक्ति की पहल की क्षमता को नष्ट कर देगी।’ स्पष्ट है, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आधार पर ही हम राजनीतिक स्वाधीनता को सही मायने में स्थापित कर सकते हैं। 

ऐसे में जब हल्द्वानी जैसी कोई घटना सामने आती है तो यह सवाल उठता ही है कि छोटी जाति और बड़ी जाति वाली मानसिकता से हम कब और कैसे मुक्त होंगे? बाबासाहेब अंबेडकर ने अपने 25 नवंबर, 1949 वाले संबोधन में कहा था कि स्वतंत्र भारत में हम विरोधाभासों में जिएंगे। राजनीतिक दृष्टि से हम सब समान होंगे, पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम में असमानता होगी। इन विरोधाभासों में हम ज़्यादा नहीं जी सकते। हमें इनसे मुक्त होना ही होगा। इनसे मुक्त हुए बिना हम अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता को सुरक्षित नहीं रख सकते। स्पष्ट है, सामाजिक विषमता से हमें जल्दी से जल्दी मुक्ति पानी ही होगी।

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