फूफा जी की टौर
- ललिता जोशी
भारत में परिवारिक संस्था की परंपरा सदियों से चली आ रही है । हमारे देश में परिवार के सदस्यों के आपस में कई रिश्ते हैं । दादा -दादी, नाना-नानी, ताऊ-ताई, चाचा -चाची, मामा -मामी, देवरानी -जेठानी, नन्द और भाभी, फूफा-फूफी और ऐसे ही बहुत से रिश्ते हैं । विदेशों का बढ़िया है वहाँ मॉम-डैड, ब्रदर-सिस्टर और आंटी-अंकल बस यही रिश्ते होते हैं । कितना अच्छा है बस आंटी -अंकल । अपने यहाँ तो ढेरों रिश्ते हैं या फिर कहें कि रिश्तों के ढेर लगे हुए हैं। हमारा देश विविधताओं का देश ऐसे ही हमारे बहुत से रिश्ते -नाते हैं । अनेकता में एकता हमारी विशेषता है । ऐसे बहुत से रिश्ते एक परिवार के सूत्र में बंधे हुए हैं । अपने उत्तर भारत में सबसे क्रिटिकल रिश्ता है बुआ जी के पति फूफा जी । फूफा जी किसी भी परिवार में महत्वपूर्ण स्थान पाये होते हैं । परिवार के दामाद जो ठहरे । अक्सर फूफाओं की छवि बहुत नेगेटिव दिखाई जाती है । फूफा जी बहुत ही नकचढ़े और तुनकमिजाज होते हैं । ऐसे ही बुआ भी बदनाम है ।
आज बाज़ारवादी और भौतिकतावादी संस्कृति और पैसों को प्राथमिकता के कारण सम्बन्धों के समीकरण भी बदल ही गए हैं । इसीलिए तो अब फूफा भी मुन्नी बदनाम हुई के तर्ज पर धकेल दिये गए हैं । बेचारे फूफा जी को उनके मूलभूत सम्मान से ही वंचित कर दिया गया तो वो तो नाराज ही होंगे न । बेचारे फूफा जी की पत्नी अगर अपने मायके वालों से अपना हिस्सा मांग ले तो वो लालची हो गए । फूफा जी अगर ससुराल के पारिवारिक समारोहों में थोडी जायज इज्जत की अपेक्षा रखें तो उन्हें तुनकमिजाज और न जाने क्या -क्या कह कर संबोधित किया जाता है । अब तो फूफा उस गरम दूध की तरह हो गए हैं जिन्हें न तो निगलते बनता है न ही थूकते । अरे फूफा अगर पसंद नहीं तो मत बुलाइये । घर बुलाकर किसी को भी बेइज्जत नहीं करना चाहिए । ये एक सामान्य सा व्यवहार होता है कि जो घर पर आमंत्रित मेहमान है उसका यथोचित सम्मान किया जाए ।
फूफा जी बोले तो समस्या न बोलें तो समस्या । बेचारा फूफा जाए तो जाए कहाँ ।बेचारे फूफा जी !अब फूफा जी ने परिवारों से बाहर निकल राजनीतिक गलियारों में भी अपनी उपस्तिथि की धमक बना ली है क्योंकि वो ज़ेन जी और ज़ेन अल्फा के करीब हैं ।
जेन जी भी आजकल चर्चा में हैं । इन्होने भी अपना प्रचंड रूप देश को दिख दिया और ये संदेश साफ -साफ दिया कि
‘छोटा बच्चा जान के ना कोई आँख दिखाना रे
अक्ल का कच्चा समझ के हमको न समझाना रे
भोली सूरत जान के हमसे ना टकराना रे
डूबी डूबी ..........
न धीं ना ना ना नाच नाच नाचा देंगे .....
आजकल अपनी जेन जी को भरमाने और लुभाने के भरपूर प्रयास किए जा रहें क्योंकि शायद फूफाजी ज़ेन जी के साथ तालमेल बिठाये हुए थे । इसी सिलसिले में फूफा याद किए जा रहे हैं।फूफा जी ने बहुतों को नानी याद दिला दी है ।जहां-जहां जेन जी वहाँ -वहाँ पर फूफा जी की ज़ोर -शोर से चर्चा हो रही है । बेचारे फूफा को घर की चौखट से निकाल कर राजनीति के मंच पर स्थापित कर दिया है । भाई ये तो फूफा जी की टौर है । इन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता है । ये तो पारिवारिक रिश्तों की खूबी है की रिश्तों की डोर तो आपस में बंधी रहती है । बहुत सी रस्में फूफा के बिना पूरी होती ही नहीं है । इसीलिए फूफा जैसा भी हो उस से रिश्ता तो निभाना ही पड़ता है ठीक ऐसे ही नेताओं को भला लगे या बुरा उन्होने इनसे रोटी -बेटी का रिश्ता बना ही लिया है। चाहे वो राजनीतिक मतभेद के कारण ही बना हो । तो प्यारे फूफा जी आप अब कभी बुरा न मानना क्योंकि आपके बिना तो हमारे देश की राजनीति भी श्रीहीन हो रही है ।
फूफा जी तो फूफा हैं ।
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)





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