जर्जर शिक्षा व्यवस्था

 राजीव त्यागी 

दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में देश की प्रगति, डिजिटल क्रांति, अंतरिक्ष उपलब्धियां, आधारभूत ढांचे का विस्तार और वैश्विक मंच पर बढ़ता प्रभाव निश्चित रूप से गौरव का विषय हैं। लेकिन इसी चमकदार तस्वीर के पीछे यदि हम सरकारी स्कूलों की ओर देखें तो एक दूसरा भारत दिखाई देता है-ऐसा भारत जहां हजारों बच्चे आज भी पर्याप्त शिक्षकों, सुरक्षित भवन, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, बिजली और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 

सवाल यह है कि जिस शिक्षा-व्यवस्था पर विकसित भारत की नींव रखी जानी है, उसकी बुनियाद ही कमजोर होगी तो 2047 का भारत कितना मजबूत होगा? सरकारी आंकड़े इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं। विडंबना यह है कि उसी देश में हम विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम, मेडिकल संस्थानों और अत्याधुनिक शिक्षण परिसरों की चर्चा करते हैं, लेकिन गांव के उस बच्चे की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं देते जो टूटी छत के नीचे बैठकर भविष्य के सपने देख रहा है। 

कहीं शिक्षक एक है और कक्षाएं पांच। कहीं विद्यालय भवन जर्जर है, कहीं पानी नहीं, कहीं शौचालय नहीं, कहीं बिजली और पंखे नहीं। हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों में विद्यार्थियों को अधिक शिक्षक, बेहतर भोजन, पेयजल, पंखे और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतरना पड़ा। फतेहपुर में तो लगभग एक हजार विद्यार्थियों ने जर्जर कक्षाओं, रिसती छतों और सुरक्षित पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए प्रदर्शन किया। 

यह स्थिति केवल किसी एक राज्य अथवा किसी एक सरकार की विफलता नहीं है। यह वर्षों से चली आ रही उस प्रशासनिक सोच का परिणाम है जिसमें शिक्षा को प्राथमिकता तो भाषणों में दी गई, लेकिन उसकी गुणवत्ता और जवाबदेही को शासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में स्थान नहीं मिला। शिक्षा विभागों में अधिकारियों और कर्मचारियों की बड़ी व्यवस्था है, बजट है, योजनाएं हैं, समितियां हैं, निरीक्षण तंत्र है-फिर भी एक शिक्षक वाले एक लाख से अधिक स्कूल कैसे बने रहे? यह सवाल केवल सरकार से नहीं, पूरे प्रशासनिक तंत्र से पूछा जाना चाहिए।

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