व्यवस्था जस की तस

इलमा अज़ीम 
बारिश का मौसम और खुदा पड़ा अपना शहर। स़ड़कों पर वाहनों का चलना मुश्किल और पैदल चला तो और भी मुश्किल। शहर के की इलाके ऐसे हैं जहां से बारिश के मौसम में निकला ही मुश्कल हो जाता है। एक तो शहर चौड़ीकरण अभियान के तहत जगह-जगह हुई खुदाई से आम जीवन बुरी तरह से प्रभावित है।

 शहर के शास्त्री नगर की कई इलाके की सड़के खासतौर से आरटीओ रोड का तो बरा हाल है। अन्य इलाकों में लिसाड़ी गेट, समर गार्डन, कंकरखेड़ा, गंगानगर, पल्लवपुरम और रोहटा-बाडम मार्ग पर भी गड्ढे व जलभराव से लोग परेशान हैं। प्रदेश की कमान संभालने के बाद सबसे पहले सड़कों को गड्ढों से मुक्ति दिलाने का आदेश योगी सरकार ने दिया था। मुख्यमंत्री की सख्ती से यह अभियान कुछ दिन तो धरातल पर दिखाई दिया। लेकिन, जैसे-जैसे समय बीतता गया। सड़कें गड्ढा मुक्त होने के बजाए गड्ढों में ही तब्दील हो गईं। वर्तमान स्थिति ये है कि सड़क पर चलना दूभर हो रहा है।

 स्कूली बच्चे हों या फिर कामकाजी लोग सड़क पर अंजाना सा डर लेकर चलने को मजबूर हैं। इसके साथ ही शहर में फैली गंदगी बारिश के दिनों में जानलेवा हो जाती है। हालांकि सफाई को लेकर हम सबके पास शिकायत है। किसी को सड़क पर पड़ा कचरा दिखता है, किसी को नाली में भरा कूड़ा, किसी को खाली भूखंड में बना कूड़ाघर। लेकिन शिकायत के साथ एक सुविधा भी है कि इसके के लिए जिम्मेदार हमेशा कोई दूसरा है। जनता कहती है, सफाईकर्मी नहीं आता। सफाईकर्मी कहता है, कचरा फिर सड़क पर डाल दिया जाता है।

 निकाय कहता है, घर-घर कचरा संग्रहण हो रहा है। और अफसर शायद यह मानकर चल रहे हैं कि शहर अपनी व्यवस्था खुद संभाल लेगा। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन शहरों की सफाई स्थायी प्राथमिकता नहीं बन पाती। वैसे, सिर्फ सरकार को दोष देकर भी हम बच नहीं सकते। सफाईकर्मी रोज नहीं आता, तो सवाल होना चाहिए। आता है और सफाई नहीं होती, तो निगरानी का सवाल होना चाहिए। जनता सड़क पर कचरा डालती है, तो नागरिक जिम्मेदारी का सवाल होना चाहिए। लेकिन इन सबसे ऊपर सवाल उन अफसरों से होना चाहिए जिनकी जिम्मेदारी ही यह सुनिश्चित करना है कि शहर व्यवस्था से चले, भगवान भरोसे नहीं। 

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