आधुनिक शिक्षा बनाम अंधविश्वास
- संजीव ठाकुर
अशिक्षा और अज्ञानता ने समाज में अंधविश्वास, रूढ़िवाद और धार्मिक कट्टरता को पनपने के लिए लंबे समय तक अनुकूल जमीन उपलब्ध कराई है। किसी अशिक्षित व्यक्ति का परंपरागत मान्यताओं और अंधविश्वासों पर विश्वास करना सामाजिक परिस्थितियों की उपज माना जा सकता है, लेकिन चिंता तब अधिक गंभीर हो जाती है जब आधुनिक शिक्षा प्राप्त, उच्च पदों पर बैठे और विज्ञान तथा तकनीक का लाभ उठाने वाले लोग भी तर्कहीन मान्यताओं के पीछे चलते दिखाई देते हैं। प्रश्न यह नहीं है कि मनुष्य की आस्था क्या है, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या उसकी आस्था विवेक, मानवीय संवेदना और तर्क की कसौटी पर खरी उतरती है? धार्मिक आस्था व्यक्ति का निजी विषय हो सकती है, किंतु अंधविश्वास तब सामाजिक समस्या बन जाता है जब वह भय, शोषण, हिंसा और विवेकहीनता को जन्म देने लगे।
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना या रोजगार हासिल करना नहीं है। शिक्षा मनुष्य को प्रश्न पूछना, प्रमाण तलाशना, तर्क करना और सही-गलत के बीच विवेकपूर्ण अंतर करना सिखाती है। विज्ञान इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाता है। मनुष्य ने जब प्रकृति और ब्रह्मांड को समझने का प्रयास किया तो अनेक ऐसी धारणाएं बदलीं जिन्हें कभी अंतिम सत्य माना जाता था। कभी पृथ्वी के स्वरूप और ब्रह्मांड को लेकर अनेक धारणाएं प्रचलित थीं, लेकिन वैज्ञानिक निरीक्षण, प्रयोग और अनुसंधान ने हमारे ज्ञान का विस्तार किया। आज वही मनुष्य अंतरिक्ष तक पहुंच चुका है, चंद्रमा पर अपने अभियान भेज चुका है और दूरस्थ ग्रहों तथा आकाशगंगाओं का अध्ययन कर रहा है। यह परिवर्तन अंधविश्वास से नहीं, प्रश्न पूछने और प्रमाण खोजने की वैज्ञानिक प्रवृत्ति से संभव हुआ है।
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी वैज्ञानिक सोच, तर्क और स्वतंत्र चिंतन का महत्व अनेक विचारकों ने रेखांकित किया था। शहीद भगत सिंह ने युवाओं से रूढ़ियों और धार्मिक अंधविश्वासों से ऊपर उठकर स्वतंत्र चिंतन अपनाने का आह्वान किया था। उनके विचारों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कशीलता सामाजिक प्रगति के महत्वपूर्ण आधार थे। उनका मानना था कि समाज की प्रगति के लिए युवाओं को पुरानी रूढ़ियों पर प्रश्न उठाने और नई सोच के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है। आज जब भारत की विशाल युवा आबादी देश की सामाजिक और आर्थिक दिशा को प्रभावित कर सकती है, तब युवाशक्ति को वैज्ञानिक चेतना, संवैधानिक मूल्यों और मानवीय दृष्टिकोण से जोड़ना और भी आवश्यक हो जाता है।
विडंबना यह है कि आज एक हाथ में अत्याधुनिक स्मार्टफोन और दूसरे हाथ में अंधविश्वास की गठरी दिखाई देती है। हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान, डिजिटल भुगतान, रोबोटिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी की दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन उसी समाज में बिल्ली के रास्ता काटने को अशुभ मानकर काम रोक दिया जाता है, किसी की छींक को अनिष्ट का संकेत समझ लिया जाता है और कौए के बोलने को मेहमान के आने से जोड़ दिया जाता है। ऐसी मान्यताएं सांस्कृतिक लोकविश्वास के रूप में मौजूद हो सकती हैं, लेकिन जब इन्हें वैज्ञानिक सत्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तब समस्या पैदा होती है। किसी घटना का संयोग से किसी दूसरी घटना के साथ घटित होना उसे कारण-संबंध सिद्ध नहीं करता।
अंधविश्वास की सबसे बड़ी ताकत भय है। जब मनुष्य किसी अनजानी बीमारी, आर्थिक संकट, पारिवारिक समस्या, संतान संबंधी चिंता या भविष्य की अनिश्चितता से परेशान होता है, तब वह किसी ऐसे व्यक्ति के प्रभाव में जल्दी आ सकता है जो उसे सरल समाधान का भरोसा देता है। इसी कमजोरी का लाभ कुछ कथित तांत्रिक, झाड़-फूंक करने वाले और भविष्य बताने का दावा करने वाले लोग उठाते हैं। राहु-केतु, ग्रहदोष, कालसर्प दोष, भूत-प्रेत या तंत्र-मंत्र के नाम पर लोगों से बड़ी रकम वसूलने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब बीमारी का वैज्ञानिक उपचार कराने के बजाय किसी व्यक्ति को झाड़-फूंक या तंत्र-मंत्र के हवाले कर दिया जाता है।
अंधविश्वास का सबसे भयावह रूप तब सामने आता है जब वह हिंसा का कारण बनता है। पशुओं की बलि, डायन या जादू-टोने के नाम पर महिलाओं के साथ हिंसा, बच्चों को तंत्र-मंत्र के नाम पर प्रताड़ित करना और कभी-कभी मानव बलि जैसी अमानवीय घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं हैं; वे सामाजिक चेतना की गंभीर कमी का संकेत हैं। किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा का मूल्यांकन उसके मानवीय परिणामों की कसौटी पर भी होना चाहिए।
विश्वास जो मनुष्य के भीतर करुणा, सत्य, सेवा और सद्भाव पैदा करे, वह समाज को जोड़ता है; लेकिन जो भय, घृणा, हिंसा या शोषण पैदा करे, उस पर प्रश्न उठाना आवश्यक है। यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि अंधविश्वास केवल अशिक्षित या ग्रामीण समाज तक सीमित है। दुनिया के अनेक विकसित और उच्च शिक्षित समाजों में भी ज्योतिष, भविष्यवाणी और विभिन्न प्रकार के अंधविश्वासों के उदाहरण मिलते हैं। अंतर यह है कि वैज्ञानिक संस्थाओं, कानून, शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक विमर्श की मजबूती यह तय करती है कि ऐसी मान्यताओं का सामाजिक प्रभाव कितना व्यापक होगा। इसलिए केवल साक्षरता बढ़ा देना पर्याप्त नहीं है। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो बच्चों को तथ्यों की जांच करना, प्रमाण और अफवाह में अंतर करना तथा किसी दावे पर विश्वास करने से पहले प्रश्न पूछना सिखाए।
आज सोशल मीडिया ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। एक झूठा वीडियो, मनगढ़ंत कहानी या चमत्कार का दावा कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। डिजिटल युग में मीडिया साक्षरता और वैज्ञानिक साक्षरता इसलिए शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बननी चाहिए। बच्चों को यह समझाना होगा कि इंटरनेट पर दिखाई देने वाली हर बात सत्य नहीं होती। किसी तस्वीर, वीडियो, संदेश या दावे को साझा करने से पहले उसके स्रोत और प्रमाण की जांच करना भी आधुनिक शिक्षा का हिस्सा है।
मीडिया की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है। समाचार माध्यमों और टेलीविजन चैनलों को केवल दर्शक और पाठक संख्या के आधार पर ऐसे दावों को बढ़ावा देने से बचना चाहिए जिनका कोई प्रमाणित आधार नहीं है। विज्ञापन और संपादकीय सामग्री के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने वाले कार्यक्रम, विज्ञान संचार, तथ्य-जांच और विशेषज्ञों की राय को अधिक स्थान मिलना चाहिए। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी नागरिकों को अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं से बचने के लिए डिजिटल विवेक विकसित करना होगा।
अंधविश्वास समाप्त करने का अर्थ आस्था समाप्त करना नहीं है। यह अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है। आस्था व्यक्ति की आध्यात्मिक अनुभूति और निजी विश्वास का विषय हो सकती है, जबकि वैज्ञानिक दावा प्रमाण और परीक्षण की मांग करता है। लोकतांत्रिक समाज में हर व्यक्ति को अपनी आस्था रखने का अधिकार है, लेकिन किसी वैज्ञानिक तथ्य का स्थान केवल इसलिए नहीं बदला जा सकता कि कोई मान्यता बहुत पुरानी है। परंपरा सम्मान योग्य हो सकती है, परंतु हर परंपरा को सत्य का अंतिम प्रमाण मान लेना तर्कसंगत नहीं है।
भारत की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में यदि आरंभ से ही बच्चों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पर्यावरण चेतना, संविधान के मूल्यों, मानवाधिकार और तर्कशील चिंतन से जोड़ा जाए तो आने वाली पीढ़ी अंधविश्वास के प्रति अधिक सजग हो सकती है। स्कूलों में विज्ञान प्रयोगशालाएं, विज्ञान मेले, प्रश्नोत्तरी, तार्किक गतिविधियां और स्थानीय अंधविश्वासों पर तथ्य आधारित चर्चा कराई जा सकती है। बच्चे जब स्वयं किसी घटना को प्रयोग और निरीक्षण के माध्यम से समझते हैं तो उनके भीतर प्रमाण आधारित सोच विकसित होती है।
वास्तव में आधुनिक शिक्षा का सबसे बड़ा लक्ष्य मनुष्य को केवल नौकरी के योग्य बनाना नहीं, बल्कि उसे विवेकशील नागरिक बनाना होना चाहिए। जिस समाज में प्रश्न पूछना अपराध समझ लिया जाए, वहां अंधविश्वास पनपता है; जिस समाज में प्रश्न पूछने, प्रमाण मांगने और असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता हो, वहां ज्ञान का विस्तार होता है। वैज्ञानिक सोच किसी धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि अज्ञान के विरुद्ध है। उसका उद्देश्य मनुष्य को भय से मुक्त करके ज्ञान, तर्क और आत्मविश्वास की ओर ले जाना है।
भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक विश्व में अपनी क्षमता का परिचय दिया है। चंद्रमा और मंगल की ओर बढ़ते कदम, डिजिटल तकनीक का विस्तार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का बढ़ता प्रभाव उस भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं जो ज्ञान आधारित भविष्य की ओर बढ़ रहा है। ऐसे भारत में अंधविश्वास, रूढ़िवाद और कट्टरता के लिए स्थान लगातार कम होना चाहिए। इसके लिए किसी एक वर्ग, धर्म या समुदाय को दोष देने के बजाय शिक्षा, वैज्ञानिक चेतना और सामाजिक जागरूकता को मजबूत करना होगा।
अंततः अंधविश्वास का सबसे प्रभावी उपचार कोई तंत्र-मंत्र नहीं, बल्कि ज्ञान है; उसका सबसे मजबूत प्रतिरोध भय नहीं, बल्कि विवेक है और उसका स्थायी समाधान केवल कानून नहीं, बल्कि शिक्षा और वैज्ञानिक चेतना है। जिस दिन भारतीय समाज में किसी भी दावे को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जाएगा कि वह पुराना है, किसी व्यक्ति के कथन को केवल इसलिए सत्य नहीं माना जाएगा कि वह प्रभावशाली है और किसी घटना को समझने के लिए प्रमाण तथा तर्क को प्राथमिकता दी जाएगी, उस दिन हम वास्तविक अर्थों में ज्ञान-आधारित समाज की ओर बढ़ चुके होंगे। शिक्षा की रोशनी जितनी व्यापक होगी, अज्ञानता का अंधकार उतना ही पीछे हटेगा। आधुनिक भारत को केवल तकनीकी रूप से विकसित नहीं, बल्कि विचारों से भी वैज्ञानिक, मानवीय और विवेकशील बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
(चिंतक एवं लेखक, रायपुर, छत्तीसगढ़)



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