कोरा लिफ़ाफ़ा  


- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'

कलेक्ट्रेट के मुख्य डाकघर का बरामदा भ्रष्टाचार की फाइलों की तरह जर्जर था जहाँ पचहत्तर साल के ओंकारनाथ जी हर सोमवार सुबह ठीक दस बजे अपनी लाठी टेकते हुए आकर ऐसे बैठ जाते थे जैसे किसी सरकारी दफ्तर में ईमानदारी गलती से आकर बैठ गई हो। उनके कांपते हाथों में खाकी रंग का एक कोरा लिफ़ाफ़ा और बिना गोंद लगा पाँच रुपये का एक नया डाक टिकट हमेशा रहता था जिसे वे अपनी हथेली पर इस तरह सहलाते थे जैसे कोई नेता चुनाव के बाद अपनी कुर्सी को सहलाता है।
डाकघर का नया पोस्टमास्टर जब भी खिड़की से उन्हें धूप में बैठे देखता तो चाय का कुल्हड़ मेज़ पर रखते हुए हँसकर कहता कि बाबा जब इस लिफ़ाफ़े पर न तो किसी का नाम पता लिखा है और न ही इस पर डाक टिकट चिपकाया है तो इसे रोज़ यहाँ लेकर क्यों चले आते हो क्या कोई बिना पते की चिट्ठी हवा में उड़कर जाएगी जैसे आज के दौर में नैतिकता बिना आधार कार्ड के स्वर्ग जाने की कोशिश करती है। ओंकारनाथ जी अपनी पुरानी ऐनक के शीशे को कुर्ते से पोंछते और बहुत धीमी आवाज़ में मुस्कुराकर कहते कि बेटा यह कोरा कागज़ केवल सादा कागज़ नहीं है बल्कि इस पूरे शहर की उस बहरी संवेदनशीलता का वो खाली पन्ना है जिस पर सच लिखने की हिम्मत किसी में नहीं बची है क्योंकि सच बोलना आजकल वैसा ही अपराध है जैसे किसी शादी में बिना लिफ़ाफ़े के खाना खाना।
दफ़्तर में आने वाले तमाम मुंशी और रजिस्ट्री कराने वाले लोग जो खुद को कानून का दामाद समझते थे उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि लगता है इस बुढ़ापे में दादाजी की सुधबुध खो चुकी है जो एक सादे लिफ़ाफ़े को अपनी जागीर समझकर पूरे डाक विभाग के सामने अपनी हाज़िरी लगाने आ जाते हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे विपक्ष संसद में बिना तैयारी के चिल्लाने पहुँच जाता है। ओंकारनाथ जी किसी की बात का तनिक भी बुरा माने बिना उस टिकट को लिफ़ाफ़े के कोने पर रखते और चुपचाप उस खिड़की को टकटकी लगाए देखते रहते थे जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के विवाह के कार्ड की प्रतीक्षा कर रहा हो।

डाकघर के तमाम कर्मचारी ओंकारनाथ जी की इस साप्ताहिक मूक उपस्थिति से पूरी तरह परिचित हो चुके थे और उन्हें एक हठी बुज़ुर्ग मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे क्योंकि इस देश में पत्थर की मूर्ति और ज़मीर की आवाज़ दोनों को अनदेखा करने की पुरानी परंपरा है। दफ़्तर का बड़ा बाबू जब भी पार्सलों का ढेर लेकर मुख्य डाकपाल के केबिन की तरफ बढ़ता तो ओंकारनाथ जी बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और हाथ जोड़कर कहते कि बाबू जी क्या आज उस पते पर जाने वाली डाक की कोई नई तारीख आई जैसे कोई अपराधी अदालत में अगली तारीख का इंतज़ार करता है। बाबू गुस्से में अपनी मुहर खटखटाते हुए डांटकर कहता कि अरे बाबा जब तक इस पर पाने वाले का मकान नंबर और शहर का नाम नहीं लिखोगे तब तक यह सरकारी थैले में नहीं जाएगा और तुम इस कोरे कागज़ को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटते रहोगे क्योंकि बिना सिफारिश के तो यहाँ भगवान भी अर्जी स्वीकार नहीं करते।

ओंकारनाथ जी बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जाते और उस टिकट को बिना चिपकाए बार बार अपनी उंगली से दबाने का निरर्थक प्रयास करने लगते थे जैसे कोई मध्यवर्ग का आदमी अपनी घटती आमदनी में बजट को दबाने की कोशिश करता है। शहर के लोग आपस में खुसर पुसर करते कि शायद बाबा का कोई पुराना पेंशन का मनीऑर्डर अटका है क्योंकि इस समाज में बिना स्वार्थ के तो लोग राम का नाम भी नहीं लेते और किसी को भी उस बिना पते के लिफ़ाफ़े और डाक टिकट के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी थाह नहीं लग पा रही थी।

एक दिन अचानक डाक परिमंडल के सबसे बड़े अधिकारी यानी पोस्टमास्टर जनरल महोदय वार्षिक समीक्षा और आधुनिक डिजिटल डाक सेवा का जायज़ा लेने के लिए उसी मुख्य डाकघर में औचक निरीक्षण करने पहुँच गए और उनके चेहरे पर वैसी ही कृत्रिम गंभीरता थी जैसी किसी महान साहित्यकार के चेहरे पर अपनी अप्रकाशित पांडुलिपि को लेकर होती है। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे दफ़्तर में वैसी ही खलबली मच गई जैसी किसी बेईमान के घर इनकम टैक्स की रेड पड़ने पर मचती है और आनन फानन में स्वागत के लिए मेज़ों पर नए कपड़े बिछाए जाने लगे ताकि गंदगी वैसे ही छुप जाए जैसे सरकारी आँकड़ों में गरीबी छुप जाती है। निरीक्षण पूरा करके जब साहब बाहर निकले तो उनकी नज़र बरामदे की बेंच पर शांत बैठे ओंकारनाथ जी पर पड़ी जिनकी हथेली में वही कोरा लिफ़ाफ़ा और टिकट रखा था जैसे किसी याचक के हाथ में खाली कटोरा और उसमें झांकती उम्मीद हो। अपनी जनप्रिय छवि का प्रदर्शन करने के लिए साहब तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर ओंकारनाथ जी के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि बाबा आप इस उम्र में यह खाली लिफ़ाफ़ा और टिकट हाथ में लिए यहाँ क्यों बैठे हैं क्या आपको डाक विभाग की किसी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है बताइए आपकी क्या शिकायत है जिसे मैं तुरंत हल करूँ क्योंकि साहब को लगा कि यहाँ भी कोई फोटो खिंचवाने का अवसर मिल जाएगा। ओंकारनाथ जी ने अपनी सूजी हुई आँखों से साहब को देखा और अपने कांपते हाथों से वह कोरा लिफ़ाफ़ा साहब की हथेली पर रखते हुए बोले कि साहब जी अगर वाकई इंसाफ़ करना चाहते हैं तो ज़रा इस लिफ़ाफ़े के अंदर रखी इस छोटी सी पर्ची को खोलकर इसका सच जान लीजिए जो आपके विभाग के गोंद से भी ज़्यादा चिपचिपा है।

साहब ने जब उस लिफ़ाफ़े के भीतर से निकली मुड़ी हुई पर्ची को पढ़ा तो उनके चेहरे का रंग पूरी तरह वैसे ही उड़ गया जैसे किसी भ्रष्ट नेता के चेहरे का रंग सीबीआई के सम्मन को देखकर उड़ जाता है और उनके हाथ कांपने लगे क्योंकि उस पर लिखा था कि आदरणीय पिता जी हम दोनों आपको छोड़कर विदेश जा रहे हैं और जब आपका यह लिफ़ाफ़ा हमारे नए घर पहुँचेगा तब हम समझ जाएंगे कि आप अकेले रहने के काबिल हो चुके हैं। ओंकारनाथ जी की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस बिना चिपके डाक टिकट पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोले कि साहब तीन साल पहले मेरा इकलौता अफ़सर बेटा मुझे इसी डाकघर के बाहर यह कहकर छोड़ गया था कि जिस दिन मैं उसका पता ढूँढ लूँगा उस दिन वह मुझे अपने पास बुला लेगा लेकिन उसने मुझे जानबूझकर अपना कोई पता नहीं दिया जैसे सरकार आम जनता को वादे तो देती है पर उन वादों का पता कभी नहीं बताती। मैं रोज़ यहाँ आकर इस टिकट को बिना गोंद के इसलिए रखता हूँ ताकि कभी भूल से भी यह लिफ़ाफ़ा डाक के डिब्बे में न गिर जाए क्योंकि अगर यह चिट्ठी कहीं नहीं पहुँची तो कम से कम मेरे दिल में यह उम्मीद तो ज़िंदा रहेगी कि मेरा बेटा अभी भी मेरी चिट्ठी का इंतज़ार कर रहा है क्योंकि झूठी उम्मीद पर ही यह पूरी दुनिया टिकी है वरना सच तो कब का आत्महत्या कर चुका होता।

यह सुनते ही साहब की आँखें भर आईं और उनका सिर शर्म से पूरी तरह झुक गया जैसे किसी चोर का सिर रंगे हाथों पकड़े जाने पर झुकता है जबकि पूरा डाकघर परिसर ऐसे गहरे सन्नाटे में डूब गया जिसने वहाँ खड़े हर इंसान के उस ज़मीर को झकझोर कर रख दिया जो बरसों से सुविधानुसार सो रहा था।

No comments:

Post a Comment

Popular Posts