ईमानदार पहल जरूरी

राजीव त्यागी 

भ्रष्टाचार एक वायरस के रूप में व्यवस्था की रगों में घर कर चुका है। इलका खामियाजा  मेरठ के शास्त्रीनगर के सेंट्रल मार्केट के व्यापारी भुगत रहे हैं। दरअसल, शुरुआती दौर में ही इसी भ्रष्टाचार के चलते इस मार्केट में तमाम अवैध निर्माण कर लिए गए। अब जब अदालत का डंडा चला तो इसकी गूंज पूरे शहर में महसू होने लगी है। यह हालात हमारे समाज के जिम्मेदारों के चरित्र, सोच और इरादों को तो दर्शाते हैं, समाज में जीवन मूल्यों के पराभव के बिंब भी उकेरते हैं। 

समाज को यह भी संदेश देती है कि हम छोटे-छोटे लालचों के लिये किस  तरह के काम कर बैठते हैं। यह तो भविष्य बताएगा कि आने वाले समय में इन पीड़ित व्यापारियों के मामले में क्या कार्रवाई होती है, लेकिन इस तरह के हालात भारतीय समाज के लिए ठीक नहीं हैं। पूरी कार्रवाई से भ्रष्टाचार की एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति भी उजागर होती है। निस्संदेह हम जानते हैं कि हमारी व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार समाज को दीमक की तरह खोखला कर रहा है। तमाम अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में भ्रष्टाचार की वैश्विक सूची में हमारी स्थिति शर्मसार करने वाली है।

 लेकिन भ्रष्टाचार को लेकर हमारी उदासीनता दुर्भाग्यपूर्ण है, सरकारों के स्तर पर भी और समाज के भी। बहरहाल, प्रदेश के शाहजहांपुर की नगर परिषद के पार्षदों द्वारा हाथ में जल लेकर ऊपरी कमाई को ईमानदारी से बांटने की खबर परेशान करती है। यह घटना सवाल उठाती है कि नगर निगमों की जो बदहाली है उसके मूल में क्या यह निगम की आय की बंदरबांट ही है? सवाल यह भी है कि जिस दल के ये पार्षद हैं उसने क्या ऊपरी कमाई के लिए शपथ मामले में कोई कार्रवाई की? प्रश्न यह भी कि जिला प्रशासन ने इस मामले में कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? जैसे कि अक्सर ऐसे मामलों में कार्रवाई करने के बजाय सिर्फ लीपापोती ही होती है, इस मामले में भी ऐसा हुआ है। शीर्ष अधिकारी की दलील थी कि इस संदर्भ में कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई है। 

क्या समाज हित में स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई नहीं की जा सकती? प्रश्न यह भी कि क्या कोई विपक्षी दल का नेता अपने राजनीतिक नफा-नुकसान के लिए मामला दर्ज कराएगा तभी ऐसे मामले में कार्रवाई होगी? बड़ा सवाल इस मामले में समाज की उदासीनता का भी है? यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि समाज में किसी भी तरह का भ्रष्टाचार ऐसे लोगों के साथ अन्याय होता है जिनका इसमें कोई कसूर नहीं होता। 

लेकिन उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। यह भी कि व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ तब आवाज उठाता है जब वह पीड़ित होता है। अन्यथा वह इसे नजरअंदाज कर देता है। बल्कि बहुत सारे लोग इसे सुविधा शुल्क के रूप में स्थापित करने की कुत्सित कोशिश भी करते हैं। जब तक भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रतिरोध के सुर प्रबल नहीं होते हमारे समाज में यह संकट बना रहेगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ समाज और शासन स्तर पर एक ईमानदार और सख्त पहल की बेहद जरूरत है, क्योंकि यह दीमक की तरह देश और व्यवस्था को खोखला कर रहा है।  

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