चेहरा झुलसा, हौसले नहीं: एसिड अटैक सर्वाइवर रेशम फातमा अब लंदन में लिखेंगी नई पहचान

रांची: कुछ कहानियां सिर्फ कामयाबी की नहीं होतीं, बल्कि वे हिम्मत, जिजीविषा और उम्मीद की मिसाल बन जाती हैं। झारखंड की रेशम फातमा की कहानी भी ऐसी ही है। 16 साल की उम्र में एसिड अटैक का दर्द झेलने वाली रेशम ने उस हादसे को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। आज उन्होंने ब्रिटेन सरकार की प्रतिष्ठित Chevening Scholarship हासिल कर एक बड़ी उपलब्धि अपने नाम की है।

इस छात्रवृत्ति के जरिए रेशम अब लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस (LSE) में उच्च शिक्षा हासिल करेंगी। रिपोर्ट के मुताबिक, वह Chevening Scholarship पाने वाली भारत की पहली एसिड अटैक सर्वाइवर हैं।

16 साल की उम्र में बदली जिंदगी

साल 2014 में रेशम महज 16 साल की थीं। जिंदगी सपनों और उम्मीदों के साथ आगे बढ़ रही थी, लेकिन एकतरफा सोच और जबरन शादी के प्रस्ताव को ठुकराने की कीमत उन्हें एसिड अटैक के रूप में चुकानी पड़ी।

एक पल में उनका चेहरा झुलस गया। दर्द, कई सर्जरी, अस्पताल के लंबे दिन और समाज की नजरों का सामना—इन सबने जिंदगी को बेहद मुश्किल बना दिया। एक वक्त उन्हें लगा कि सब कुछ खत्म हो गया है। लेकिन रेशम ने हार मानने के बजाय खुद को संभाला।

वह कहती हैं कि उन्होंने खुद से तय किया कि उनकी पहचान उस हमले से नहीं बनेगी। शिक्षा ने उन्हें दोबारा जिंदगी को समझने और आगे बढ़ने की ताकत दी।

शिक्षा को बनाया अपनी ताकत

रेशम ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया से स्नातक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। शिक्षा हासिल करने के साथ उन्होंने महिलाओं और बेटियों की शिक्षा तथा नेतृत्व विकास के लिए काम शुरू किया।

उन्होंने एब्राह फाउंडेशन की स्थापना की, जिसके जरिए लड़कियों को शिक्षा और आगे बढ़ने के अवसर देने की कोशिश की जा रही है।

रेशम के इस सफर में उनका परिवार भी मजबूती से उनके साथ खड़ा रहा। माता-पिता के सहयोग के साथ उनके जीवनसाथी असगर ने भी उनका हौसला बढ़ाया। वर्ष 2024 में शादी के बाद भी असगर ने उनके सपनों को आगे बढ़ाने में उनका साथ दिया।

2015 में मिला राष्ट्रीय वीरता सम्मान

रेशम के साहस को देश पहले ही पहचान चुका है। एसिड अटैक के बाद न्याय के लिए उनकी लड़ाई और उनके साहस के लिए वर्ष 2015 में उन्हें राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार (भारत पुरस्कार) से सम्मानित किया गया था।

उन्हें राष्ट्रपति भवन में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मिलने का अवसर भी मिला था। गणतंत्र दिवस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में उन्हें राष्ट्रीय वीरता सम्मान प्रदान किया गया।

लेकिन रेशम के लिए असली जीत किसी पुरस्कार से ज्यादा उस आत्मविश्वास को वापस हासिल करना है, जिसे उन्होंने अपने संघर्ष और मेहनत से दोबारा खड़ा किया।

अब लंदन में नई उड़ान

Chevening Scholarship के जरिए रेशम अब LSE में उच्च शिक्षा हासिल करेंगी। उनके लिए यह सिर्फ विदेश जाकर पढ़ाई करने का अवसर नहीं, बल्कि अपने संघर्ष को एक बड़े सामाजिक उद्देश्य से जोड़ने की नई शुरुआत है।

रेशम का सपना है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटकर वह शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और एसिड अटैक सर्वाइवर्स के पुनर्वास के क्षेत्र में बड़े स्तर पर काम करें।

उनका मानना है कि किसी लड़की को अगर सही अवसर और शिक्षा मिल जाए, तो वह सिर्फ अपनी जिंदगी नहीं, बल्कि पूरे समाज का भविष्य बदल सकती है।

'मुश्किलें रोकने आती हैं, हराने नहीं'

रेशम युवाओं को संदेश देती हैं कि मुश्किलें जिंदगी में रोकने के लिए आती हैं, हराने के लिए नहीं। विश्वास और शिक्षा को अपनी ताकत बनाकर इंसान बड़े से बड़े संघर्ष को पार कर सकता है।

रेशम फातमा की कहानी सिर्फ एक प्रतिष्ठित छात्रवृत्ति हासिल करने की कहानी नहीं है। यह उस हौसले की कहानी है जिसने दर्द को ताकत में बदला। यह उस लड़की की कहानी है जिसने अपने चेहरे के जख्मों से ज्यादा अपने सपनों को महत्व दिया।

रेशम की कहानी याद दिलाती है कि चेहरे पर पड़े निशान किसी इंसान की पहचान नहीं होते। असली पहचान उसके हौसले, संघर्ष और सपनों से बनती है।

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