राजीव त्यागी
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र की आवश्यकता है, लेकिन जब यही प्रतिस्पर्धा व्यक्तिगत कटुता, अपमानजनक भाषा, आरोप-प्रत्यारोप और सोशल मीडिया की आक्रामकता में बदलने लगे, तो उसका असर केवल नेताओं तक सीमित नहीं रहता। धीरे-धीरे इसका प्रभाव समाज और आम लोगों के संबंधों पर भी पडऩे लगता है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है और सरकार का दायित्व उन सवालों का जवाब देना। समस्या विरोध में नहीं, बल्कि विरोध के तरीके और भाषा में है।
जब बहस विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासन जैसे मुद्दों से हटकर व्यक्तियों पर केंद्रित होने लगे, तो राजनीतिक संवाद कमजोर होता है। असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन असहमति को शत्रुता में बदल देना लोकतंत्र की कमजोरी है। एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर उठता है कि क्या हमारी राजनीति जनहित और नीतियों से ज्यादा सत्ता बचाने और राजनीतिक नफा-नुकसान पर केंद्रित होती जा रही है?
यदि राजनीति हमें यह सिखाने लगे कि दूसरे विचार वाला व्यक्ति केवल विरोधी नहीं, बल्कि दुश्मन है, तो यह समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए चिंता का विषय है। धर्म और आस्था से जुड़े मुद्दों पर भी राजनीतिक बयानबाजी बहुत सावधानी से होनी चाहिए। नेता जिस भाषा का प्रयोग सार्वजनिक मंचों पर करते हैं, वही भाषा धीर-धीरे कार्यकर्ताओं और समर्थकों तक पहुंचती है।
सोशल मीडिया इसे और अधिक तीखा कर देता है। आज राजनीतिक पोस्टों के नीचे तर्क से अधिक व्यक्तिगत टिप्पणियां, व्यंग्य और अपमान देखने को मिलता है। आजकल सोशल मीडिया पर जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है।
उससे राजनीतिक मर्यादा पर सवाल खड़े हो रहे हैं। किसी मुख्यमंत्री, मंत्री या विपक्ष के नेता की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आलोचना की भाषा गरिमापूर्ण होनी चाहिए। बिना सत्यापन के राजनीतिक संदेश साझा करना, अपमानजनक भाषा को बढ़ावा देना और अपने पसंदीदा दल की हर बात को सही मानना राजनीतिक कटुता को बढ़ाता है। लोकतंत्र में मतदाता को समर्थक बनने से पहले जिम्मेदार नागरिक होना चाहिए।





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