रिश्तों के बदलते ताने -बाने
- ललिता जोशी
सामाजिक प्राणी कहलाने वाला मनुष्य अब कितना सामाजिक रह गया है ये तो आजकल समाचार पत्रों और न्यूज़ चेनलों में आने वाली खबरों से पता चलता ही रहता है । सामाजिक प्राणी है कि नहीं अब तो ये मनुष्य पारिवारिक प्राणी भी नहीं रहा । अभी हाल ही में एक के बाद एक समाचार आया कि कुछ वृद्धाश्रमों में बुजुर्ग माता -पिताओं की मृत्यु हो गई और उनके अंतिम संस्कार पर उनके बच्चे पहुंचे ही नहीं , जब वृद्धाश्रम वालों ने इन बुजुर्ग लोगों के बच्चों से संपर्क किया तो उन्होंने पहले तो कुछ समय मांगा और उसके बाद टालमटोल करने लगे तो वृदधाश्रम व्लोन को समझ आ गया कि इनके बच्चे इनके अंतिम दर्शन और अंतिम संस्कार के लिए आना ही नहीं चाहते हैं।
वैसे तो आम धारणा है कि पुत्र अपनी ज़िम्मेदारी सही से नहीं निभाते हैं लेकिन अब पुत्रियाँ भी पुत्रों के नक्शे कदम पर चल पड़ी हैं और माता -पिता को वृद्धाश्रमों के बाहर या फिर उन्हें ऐसी सार्वजनिक जगह पर छोड़ जाते हैं। जहां से समाज सेवी इन बुजुर्गों को वृद्धाश्रमों में ले जाकर रख देते हैं। ये तो वो बुजुर्ग हैं जिन्हे उनकी अपनी औलाद ही लावारिस की तरह कहीं भी छोड़ जाती है। दूसरे तरह के वो बुजुर्ग होते हैं जो घरेलू हिंसा के कारण खुद ही घर से निकल जाते हैं। तीसरे किस्म के वो बुजुर्ग होते हैं जिन्हे उनके बच्चे खुद ही देखभाल करने की असमर्थता के कारण उन्हे वृद्धाश्रमों में छोड़ जाते हैं । बुजुर्ग अपनी जवानी में जब अपने ही बच्चों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं तो जब बच्चे सक्षम हो जाते हैं तो वो अपनी कटुता कभी भूल पाते हैं तो कभी नहीं भूल पाते तो वो भी इनकी ज़िम्मेदारी नहीं उठाना चाहते ।
अब तो कलयुग है कोई सतयुग नहीं चल रहा है कि मां के एक आदेश पर वो राजपाट छोड़ वनवास चले गए थे । बदलते पारिवारिक समीकरणों के कारण रिश्तों की परिभाषा भी दिनोदिन बदलती जा रही है । कामकाज के कारण भागदौड़ भरी ज़िंदगी ने युवा दम्पतियों का जीवन घर और कार्यालय के दायरे में बंध कर रह गएहैं । इस दबाव के कारण आज का युवा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं ।
आज तलाक के मामले भी बढ़ते ही जा रहे हैं । इतना ही नहीं महिला और पुरुष दोनों ही घरेलू हिंसा का शिकार बन रहे हैं । सास और बहू एक दूसरे के साथ दुर्व्यवहार करती हैं । पहले महिलाओं को दहेज के लिए उत्पीड़ित किया जाता था । इसका अर्थ ये कतई नहीं है की अब ये सब नहीं होता । आज भी समाज के पढ़े-लिखे लोग अपनी बहुओं के साथ हिंसा करते हैं और इतना ही नहीं उन्हें मार डाला जाता है । अभी मध्यप्रदेश का हाईप्रोफाइल केस देश के लोगों ने देखा और ये सभी समाचारों पत्रों और मीडिया चैनलों की सुर्खियां में था ।ऐसे कई मामले हैं । अब 21वीं सदी में जब महिलाओं के सशक्तिकरण पर सरकारें बहुत काम कर रही हैं और महिलाएं भी सशक्त हो रही हैं । प्रत्येक क्षेत्र में महिलाएं अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं । अब तो बहुत सी महिलाओं ने भी अपने पतियों को मौत के घाट ऐसे उतारा कि जब लोगों को इसका पता चला तो सब इनकी क्रूरता को देख लोग को भावनात्मक धक्का लगा।
हमारे समाज में आज भी महिलाओं से अपराध की कल्पना नहीं की जाती है। अब हमारा समाज बदल रहा है। हम जिन मूल्यों की बात करते हैं उनका अवमूल्यन हो रहा है । समाज के किसी भी तबके या प्रोफेशन में हमें ये सब आमतौर पर देखने को मिलता ही रहता है । मूल्य किस चिड़िया का नाम है भई ? आज के दौर में जैसे विक्रेताओं के यहाँ लिखा होता है कि फैशन के इस दौर में गारंटी की इच्छा न रखें । ऐसे ही पूंजीवाद और बाजारवाद के इस दौर में मानव और मानवीय मूल्यों की क्या गारंटी ? गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में पैसा कमाने की अंधी दौड़ में आदमी ही आदमी का दुश्मन बना हुआ है । नाबालिग आजकल जिस तरह से अपराध कर रहे हैं उसे देखकर तो लगता है कि ये बड़े -बड़े अपराधियों के गुरु हैं । जिस बचपन को स्कूल और खेल -कूद के मैदान में होना चाहिए वो नशे और अपराध की दुनिया में आकंठ लिप्त हैं । सड़कों के किनारे और लालबत्ती पर भीख मांगते ,बच्चे और औरतें अक्सर दिखाई पड़ जाते हैं ।
हमारी राजनीतिक पार्टियां पहले जनकल्याण की भावना पर काम करती थीं लेकिन अब जनकल्याण के नाम पर अपनी पार्टी को जिताने के लिए काम करते हैं । आम आदमी से लेकर खास आदमी की कीमत तय हैं ।जिसका जितना दाम उसको उतने में खरीद लो । टैक्सपेयर के पैसे से जनता को सुविधा दो और फिर अपने नाम को चमकाओ । इसके एवज में जीत का सेहरा अपने दल के सिर पर बांध कर सत्ता का सुख लेते हैं । सत्ता पर कब्जा जनता के पैसे से जनता पर उपकार का ऋण चढ़ा दिया जाता है । जनता खुद को धन्य समझती है और उसका रोम-रोम कृतार्थ हो जाता है । इन राजनेताओं को ये जनता अपना आराध्य समझने लग जाती है । राजनेता खुशहाल और जनता फटेहाल । युवा बेरोजगारी से बेहाल हैं । इतना ही नहीं पेपर की लीकेज भी इनका पीछा छोड़ ही नहीं रही है । सड़क से संसद तक धरना चल रहा है।
आइये अब मंदिरों का हाल भी देख लेते हैं । मंदिर में पुजारी भक्त और भगवान के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है । आजकल भक्त को भरोसा होता है पुजारी उसका चढ़ावा भगवान तक पहुंचता है । मगर भक्तों की आँख जब खुली तो पाया की भगवान की ये महत्वपूर्ण कड़ी तो भगवान की अमानत में ही खयानत करने में लगी हुई है । जिस पुजारी को भगवान का अनन्य सेवक माना जाता है। वही सेवक अब सेवक कम चढ़ावा के बढ़ावा उदरस्थ करता जाता है । भगवान का भय और पाप -पुण्य तो भोले -भाले श्रद्धालुओं के लिए होता है ।चंदा चोरों के लिए नहीं । भक्तों के विश्वास को कितना आघात लगता है ये कोई उनसे पूछे । भक्तों की भी महिमा अपरम्पार है । भगवान के दर्शनों के साथ आजकल भक्त भक्ति से ज्यादा अपनी रील के चक्कर में ज्यादा रहते हैं ताकि उनके फोलोवर्स बढ़ते ही रहें । देखते जाइए रिश्तों के ताने -बाने बदल रहे हैं । सभी धर्मों के अनुयायियों की कमोबेश यही स्थिति है ।
आधुनिक शैली की बहती आधुनिकता की आंधी
परायी हो रही है जिस से आज अपनी ही माटी,
आज कुछ है तो बस स्वच्छ्ंद रहने की जिजीविषा
मनों में बस चुकी है शर्तों में जीने की मनीषा,
आज सब हैं बेबसी लाचारी की ज़िंदगी जीते
कुछ इस तरह से गूंगे बहरे हो गए ये...रिश्ते।
(मुनिरका एंक्लेव, दिल्ली)





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