बुजुर्ग मां-बाप बोझ नहीं
इलमा अज़ीम
बुजुर्गों, खास तौर पर मां-बाप के प्रति संवेदनहीनता की एक घटना पिछले दिनों सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में रही। लोग इसे बच्चों और मां-बाप के रिश्तों में आती कड़वाहट और आधुनिक समाज की संवेदनहीनता के उदाहरण के रूप में देखा। मां-बाप ने बिना किसी स्वार्थ के हमें चलना, बोलना और जीना सिखाया है। जब माता-पिता को सबसे ज्यादा प्यार और सहारे की जरूरत होती है, तब उनका साथ देना हर संतान का पहला धर्म होना चाहिए।
माता-पिता बोझ नहीं, बल्कि घर की छांव और अनुभव की पूंजी होते हैं। जब बच्चे अपने माता-पिता को बोझ समझने लगते हैं, तो यह उस रिश्ते की पवित्रता पर एक गहरा आघात है। बढ़ता एकल परिवार, महिलाओं द्वारा धन अर्जन में प्रत्यक्ष भागीदारी, अच्छे संस्कारों का अभाव, बुजुर्गों द्वारा अपने जीवनकाल में अपने स्वास्थ से अधिक दूसरे कार्यों को महत्व देना, बुजुर्गों द्वारा अपने यौवनकाल में अपने बुजुर्गों की खुशी से समुचित देखभाल न करना, भौतिक उपलब्धियों को ही एकमात्र जीवन में सफलता समझना, दोहरे मापदंड, हर क्षेत्र में सफलता पाने के लिए अत्यधिक प्रतियोगिता होना, असंतुष्ट मानव स्वभाव हमारी संस्कृति पर आघात है।
आज के बच्चे तर्क देते हुए कहते हैं कि घर चलाने के लिए धन कमाने के काम में लंबा समय व्यतीत करने के बाद इतनी ऊर्जा नहीं रहती कि घर की दूसरी जिम्मेदारियों को भी खुशी से पूरा किया जाए। माता-पिता हर मुश्किल के बीच अपनी संतान को बहुत प्यार से पालते हैं, जबकि आज की संतान ऐसा खुशी से नहीं कर पाती। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि 21वीं सदी में सामाजिक रिश्ते काफी दबाव से गुजर रहे हैं।
लेकिन निराशाजनक बात यह है कि माता-पिता और बच्चे का पवित्र रिश्ता उथल-पुथल का शिकार हो गया है और आज कई बच्चे अपने बूढ़े माता-पिता को बोझ समझते हैं। बच्चों के लिए उनके माता-पिता आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बोझ बन जाते हैं। पीढ़ी अंतराल, यानी जेनरेशन गैप के उभरते मुद्दे ने वृद्ध माता-पिता को छोड़ दिए जाने की समस्या में भी योगदान दिया है। अधिकतर लोग अपने स्वभाव से अधिक व्यक्तिवादी होते जा रहे हैं।
ऐसी परिस्थितियों में, युवा पीढ़ी अपने माता-पिता और दादा-दादी, नाना-नानी के पारंपरिक विचारों को सुनने और समझने में कम रुचि रखती है। यह हमारी शिक्षण व्यवस्था की एक बड़ी विफलता है। छात्रों को सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने के लिए तैयार करना शिक्षा का केंद्र बिंदु नहीं होना चाहिए। बच्चों के लिए कहना होगा कि मॉडर्न आधुनिक शिक्षा जरूर ग्रहण करिए, जीवन में उन्नति हासिल करिए, विकास करिए, लेकिन उम्रदराज बुजुर्ग माता-पिता के लिए वक्त जरूर निकालिए।





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