सोशल मीडिया और बालमन
राजीव त्यागी
बच्चों पर सोशल मीडिया की स्वच्छंदता से पड़ने वाले घातक प्रभाव अभी सामने आने लगे हैं। बच्चे समय से पहले परिपक्व हो रहे हैं। किशोरों की यौन हिंसा और वयस्कों जैसे अपराधों में संलिप्तता, इसके घातक प्रभावों की बानगी है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुई शिवकुमार तिवारी हत्याकांड भी इसकी एक बानगी है। आरोपी 15 साल का नाबालिग है, लेकिन वारदात करते समय पूरा वाकया सोशल मीडिया पर डाला जाता है।
लगता है कि आरोपी खुद चाहता था कि सोशल मीडिया पर इस वारदात की पूरी क्लिपिंग लोगों के सामने आए।दरअसल सोशल मीडिया पर बच्चों की नजर से ऐसे वीडियो गुजरते हैं, जिसमें स्वच्छंद व्यवहार पेश किया जा रहा है चाहे वह यौन अपराध हो या फिर कोई अन्य अपराध।
असलहे के साथ साथ रील बनाना तो आम बात हो गई है। अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि कोरी स्लेट जैसे बालमन पर इसका कितना घातक असर पड़ता होगा? उसे पवित्र रिश्तों की दरकन और यौन-स्वच्छंद तथा गंभीर अपराध आम नजर आने लगते हैं। अमेरिका तथा कुछ अन्य विकसित देशों के स्कूलों में दना-दन गोलियां चलाते बच्चे इंटरनेट पर प्रसारित घातक सामग्री देखने से उपजी सनक की ही देन है। निस्संदेह, बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा हेतु डिजिटल दुनिया को साफ-सुथरा रखने की जरूरत है।
यही वजह है कि एक अमेरिकी अदालत ने फेसबुक और इंस्टाग्राम की मातृ संस्था मेटा पर 5,390 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। जुर्माना ज्यादा नहीं है क्योंकि पिछले साल कंपनी ने साठ अरब डॉलर का मुनाफा कमाया। उल्लेखनीय है कि अमेरिका के कई राज्यों में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ मुकदमें चल रहे हैं। फ्रांस व आस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया पर सक्रियता को लेकर बच्चों की उम्र की सीमा तय की गई है।
हकीकत यह है कि कंपनी ने ये प्लेटफाॅर्म अपने मुनाफे के लिये इस तरह तैयार किए हैं ताकि बच्चों को इसकी लत लग जाए। पिछले दिनों भारत सरकार ने मेटा के अधिकारियों को बुलाकर विरोध जताया था कि उसके एक प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े विज्ञापन भारी मुनाफा कमाकर प्रसारित किए गए। अमेरिकी अदालत ने भी माना है कि मेटा के प्लेटफॉर्म बच्चों को यौन शोषण से बचाने में विफल रहे हैं।
यही वजह कि कोर्ट ने लगाए गए जुर्माने की राशि का एक भाग ऐसे पीड़ितों को मुआवजे के तौर पर देने के आदेश दिए हैं। समय आ गया है कि सोशल मीडिया कंपनियों को सामाजिक जवाबदेही के लिये बाध्य किया जाए। लेकिन यह नहीं हो कि अमेरिका के बच्चों के लिये अलग कानून और विकासशील व गरीब मुल्कों के बच्चों के लिये अलग कानून हो। हमारी सरकारों को भी इन सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर गैर-कानूनी सामग्री प्रसारित करने के खिलाफ सख्त रवैया अपनाना होगा।





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