चिंताजनक बेरोजगारी
इलमा अज़ीम
देश में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि चिंता का कारण है। हमेशा से भारतीय समाज में शिक्षा को सदियों से बौद्धिक उत्थान का माध्यम माना गया था। आधुनिक दौर में इसका स्थान आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा की गारंटी ने ले लिया है। बचपन में जब कोई बच्चा पहली बार स्कूल जाता है, तो परिवार और समाज मिलकर उसके दिल और दिमाग में एक ही विचार ठोकते जाते हैं कि बस बारहवीं पास कर लो, फिर जीवन संवर जाएगा। बारहवीं के बाद यह वादा ग्रेजुएशन और फिर पोस्ट ग्रेजुएशन तक खिसक जाता है।
माता-पिता अपनी जीवनभर की जमा पूंजी, जमीन-जायदाद या पेंशन का पैसा दांव पर लगाकर संतान को हायर एजुकेशन की अंधी दौड़ में झोंक देते हैं। वर्षों की मेहनत और लाखों के खर्च के बाद जब यह युवा डिग्री लेकर बाजार में खड़ा होता है, तो जीवन की हकीकत का काला सच उसके सारे भ्रम तोड़ देता है। तब अहसास होता है कि जिस व्यवस्था को छात्र अच्छा भविष्य समझ रहा था, वह असल में उसकी उम्मीदों का शमशान साबित हुई।
आज उच्च शिक्षा रूपी उद्योग हर साल लाखों की तादाद में इंजीनियर, डॉक्टर, एमबीए, वकील और आट्र्स-साइंस ग्रेजुएट्स तैयार करने वाली एक विशाल डिग्री फैक्टरी बन चुका है। लेकिन इस संख्यात्मक विकास के पीछे गुणात्मक पतन का एक भयावह सच छिपा है। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रोजगार सर्वेक्षणों के आंकड़े बताते हैं कि देश के लगभग 50 प्रतिशत से अधिक ग्रेजुएट सीधे तौर पर उद्योग की जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं। शिक्षा का बाजारीकरण मध्यमवर्गीय परिवारों की जेब और युवाओं की मानसिक शांति दोनों को खाली कर रहा है।
मध्यमवर्गीय परिवार अपने जीवन की सारी सुरक्षा त्यागकर बच्चों की उच्च शिक्षा में निवेश करते हैं। इसे वे अपने भविष्य की सबसे सुरक्षित एफडी मानते हैं। लेकिन इसका रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट बेहद निराशाजनक है। जब 20 लाख रुपए का एजुकेशन लोन लेकर पढ़ाई पूरी करने वाले युवा को 15000 रुपए की नौकरी मिलती है, तो वह लोन की किस्त चुकाने में ही असमर्थ हो जाता है। चपरासी या नगर निगम की सफाई कर्मचारी भर्ती में जब पीएचडी और एम. टेक पास युवा कतार में खड़े दिखते हैं, तो यह केवल बेरोजगारी का संकट नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था के दिवालियापन का प्रमाण है।





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