राजीव त्यागी
इन दिनों अयोध्या के हनुमान गढ़ी के महंत की गाली की चर्चा चतेज है। एक डिबेट के दौरान उन्होंने कांग्रेस के प्रवक्ता को खुलेआम गाली देते दिखे। लगता है कि गाली इन दिनों राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं। जंतर-मंतर पर प्रधानमंत्री मोदी को लेकर दी खुलेआम गंदी गालियां इसका बहाना बनीं हैं।
हैरत की बात है कि इसमें कई प्रोफेसर और पत्रकार भी शामिल हो गए हैं और अब साधु-संत भी। समाज का एक बड़ा तबका इस नई प्रवृत्ति की मुखालफत कर रहा है। उसका कहना है कि गालियां भले हीं समाज में सदा से चली आ रही हैं, लेकिन कम से कम उनकी सार्वजनिक स्वीकृति नहीं रही है। गालियों के समर्थकों में सबसे बड़ी संख्या खुद को क्रांतिकारी मानने वाले वामपंथी हैं। तर्क दिया जा रहा है कि भारतीय समाज में शादी-ब्याह और मुंडन-जनेऊ के मौके पर प्यार से गालियां दी जातीं हैं। लिहाजा से जंतर-मंतर की गालियां भी उन्हीं गालियों की तरह स्नेह की अभिव्यक्ति हैं।
लेकिन क्या सचमुच ऐसा ही है ? गंभीरता से विचार करेंगे तो इसका जवाब ना में मिलता है। इस अश्लील अभिव्यक्ति का मकसद देश के संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए हिकारत और घृणा का प्रदर्शन है। यह सही है कि हर समाज में गालियां किसी न किसी रूप में रही हैं। लेकिन वे कभी सार्वजनिक स्वीकार्यता और विमर्श का विषय नहीं रही हैं। गालियां संस्कार से जुड़ी हैं। भाषाशास्त्री शब्द शक्ति की बात करते हैं। शब्द शक्ति में श्लील और अश्लील को लेकर भाषा शास्त्री स्पष्ट विभाजन स्वीकार करते हैं। वे मानते हैं कि श्लील ही सार्वजनिक चर्चा और अभिव्यक्ति का माध्यम होता है।
सच तो यह है कि गालियां कभी यथार्थ नहीं होती। तर्क दिया जा रहा है कि जेन जी की यही भाषा है। वह ऐसे ही खुद को अभिव्यक्त करता है। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या वह परीक्षा में भी वह गालियों को अपनी जवाब में शामिल करता है?और क्या वह स्वीकार्य होगा? निश्चित तौर पर इन सवालों का जवाब ना में है। फिर यह सवाल क्यों ना उठे कि गालियों का महिमा मंडन क्यों? ऐसे में प्रश्न यह है कि भारतीय समाज प्रधानमंत्री को सार्वजनिक तौर पर दी जाने वाली गालियों और असभ्यता को क्यों स्वीकार किया जाए? नई पीढ़ी को असभ्य बनाने की प्रक्रिया को बढ़ावा क्यों दिया जाए।




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