टूटे स्कूल, टूटा भरोसा: पारदर्शिता से इतना डर क्यों?


- नृपेन्द्र अभिषेक 'नृप'
पिछले कुछ हफ़्तों में देश के दो अलग-अलग राज्यों से जो ख़बरें सामने आईं, उन्होंने शिक्षा व्यवस्था की उस तस्वीर को उघाड़ कर रख दिया है जिसे छिपाने की भरसक कोशिश की जा रही थी। पश्चिम बंगाल में जब सीजेपी से जुड़े एक कार्यकर्ता एक सरकारी स्कूल की वास्तविक हालत लोगों के सामने लाने पहुँचे, तो उन्हें और उनके परिवार को बुरी तरह पीटा गया,इसी पिटाई से उनके पिता की मौत हो गई। लगभग उसी समय राजस्थान में स्कूल का हाल दिखाने गए आशुतोष के गाड़ी पर हमला बोल दिया गया। ये दोनों घटनाएँ अलग राज्यों, अलग सरकारों और अलग परिस्थितियों की हैं, मगर इनके पीछे छिपा डर एक जैसा है। और यही डर आज सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है, आख़िर स्कूलों के भीतर की सच्चाई दिखाने से किसे इतनी तकलीफ़ हो रही है?

यह कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसी सरकारों ने विधिवत रूप से स्कूलों में मीडियाकर्मियों और यूट्यूबरों के प्रवेश पर रोक लगा दी है। सोचने वाली बात यह है कि जो सरकारें अपनी हर योजना का ढिंढोरा पीटने में, हर उद्घाटन का वीडियो बनवाने में, हर होर्डिंग पर अपनी तस्वीर लगवाने में पीछे नहीं रहतीं, वही सरकारें जब स्कूल के कमरों, टूटी बेंचों, बिना छत की इमारतों और शिक्षकविहीन कक्षाओं का कैमरा सामने आने की बात आती है तो दरवाज़े बंद क्यों कर लेती हैं? अगर वाकई स्कूलों में पढ़ाई का स्तर अच्छा है, बच्चों को पौष्टिक मिड-डे मील मिल रहा है, शिक्षक समय पर आते हैं और बुनियादी सुविधाएँ मौजूद हैं, तो एक आम नागरिक के कैमरे से इतना ख़ौफ़ किस बात का? सच तो यह है कि जो जितना पारदर्शी होता है, वह उतना ही निडर होकर हर जाँच का स्वागत करता है और जो हर निरीक्षण से भागता है, हर सवाल पर हिंसा पर उतर आता है, उसकी घबराहट ही उसकी असलियत बयान कर देती है।

यह सवाल केवल कुछ कार्यकर्ताओं पर हुए हमले तक सीमित नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है जो अपने ही नागरिकों से, अपने ही बच्चों के भविष्य से जुड़ी जानकारी छिपाना चाहती है। सरकारी स्कूल किसी राजा-महाराजा की निजी संपत्ति नहीं हैं, वे जनता के पैसे से, जनता के लिए बनाए गए संस्थान हैं। जब कोई नागरिक अपने टैक्स के पैसों से बने स्कूल की हालत जानना चाहता है, तो यह उसका मौलिक अधिकार है, कोई एहसान नहीं जो सरकार उस पर कर रही है। मगर विडंबना देखिए कि वही अधिकार माँगने पर लाठियाँ बरसाई जा रही हैं, गाड़ियों पर हमले हो रहे हैं, और परिवारों तक को निशाना बनाया जा रहा है। यह सिर्फ़ एक कार्यकर्ता पर हमला नहीं, बल्कि पारदर्शिता की माँग करने वाले हर नागरिक को दी जा रही एक धमकी है, "चुप रहो, वरना यही अंजाम होगा।"

एक और गहरी बात इस पूरे प्रकरण में छिपी है। जिन नेताओं, अधिकारियों और धनाढ्य वर्ग के लोगों के हाथों में सत्ता और व्यवस्था की डोर है, उनके अपने बच्चे विदेशों में, या देश के महँगे प्राइवेट स्कूलों और यूनिवर्सिटियों में पढ़ते हैं। सरकारी स्कूलों की टूटी छतों और खाली कक्षाओं से उनका कोई निजी सरोकार नहीं होता, क्योंकि उनके अपने बच्चों को इन हालातों से कभी गुज़रना ही नहीं पड़ता। सरकारी स्कूलों में तो उन्हीं ग़रीब और मेहनतकश परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं जिनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। और जब यही बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं, तो यह सिर्फ़ उनका नुक़सान नहीं, बल्कि पूरे समाज की सोच-समझ की सीढ़ी को कमज़ोर करने जैसा है। एक अशिक्षित, अनपढ़ और सवाल न पूछने वाली जनता किसी भी सत्ता के लिए सबसे सुविधाजनक होती है- वह न विरोध करती है, न अपने अधिकार माँगती है, बस चुपचाप वही मानती चली जाती है जो उसे बताया जाता है। शायद यही वजह है कि पढ़े-लिखे, जागरूक और सवाल पूछने वाले नागरिकों की जगह एक ऐसी भीड़ तैयार करने की कोशिश हो रही है जो बिना सोचे-समझे लाठी उठाकर चल सके।

आज सीजेपी जैसे संगठनों की "स्कूल ठीक करो" मुहिम ने जो अलख जगाई है, उसका असर अब ख़ुद स्कूलों के भीतर से दिखने लगा है। कई जगहों पर छोटे-छोटे बच्चे भी अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए, अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने और आंदोलन करने लगे हैं। यह वाकई सोचने वाली बात है, अगर स्कूलों में सब कुछ ठीक-ठाक होता, तो आख़िर ये मासूम बच्चे विरोध करने की राह पर क्यों निकलते? बच्चों की यह जागरूकता बताती है कि सच्चाई को कितना भी दबाया जाए, वह किसी न किसी रास्ते से बाहर आ ही जाती है। और यही जागरूकता सत्ता के गलियारों में बेचैनी की असली वजह बन गई है। जिस दिन आम जनता और उनके बच्चे यह समझ जाते हैं कि उनका हक़ क्या है, उस दिन झूठे वादों और खोखले दावों की राजनीति चलनी मुश्किल हो जाती है। यही डर है जो सरकार को सता रहा है, सत्ता खिसकने का डर, जनता के जाग जाने का डर।

इसी घबराहट में सरकार के इशारे पर पलने वाले तत्व गुंडागर्दी पर उतर आए हैं, यह मानते हुए कि डरा-धमकाकर वे सच को दबा देंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि लाठी और डंडे से सच्चाई को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। और जो लोग आज इस तरह की हिंसा में सरकार का साथ दे रहे हैं, उन्हें एक बार ठहरकर सोचना चाहिए कि शिक्षा किसी एक वर्ग या जाति की बपौती नहीं, बल्कि हर बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है। आज जिस स्कूल की हालत को छिपाने के लिए वे लाठी उठा रहे हैं, कल वही हालत उनके अपने बच्चों या पोते-पोतियों को भी झेलनी पड़ सकती है। सच्चाई को दबाने वाला हाथ हमेशा के लिए मज़बूत नहीं रहता।

अब यह लड़ाई सिर्फ़ कुछ कार्यकर्ताओं पर हुए हमलों की नहीं, बल्कि उस पूरे विचार की है जो कहता है कि जनता को अपने संस्थानों के बारे में जानने का पूरा हक़ है। जब बच्चे ख़ुद जाग चुके हैं, जब समाज सवाल पूछना सीख चुका है, तो सरकार का दिखावा और झूठे वादों का सिलसिला ज़्यादा दिन नहीं चल सकता। अब समय आ गया है कि सरकारें डराने-धमकाने और पाबंदियाँ लगाने के बजाय अपनी शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार पर ध्यान दें, ताकि किसी भी नागरिक को स्कूल का दरवाज़ा खटखटाने पर डर या हिंसा का सामना न करना पड़े, बल्कि पारदर्शिता का स्वागत हो। शिक्षा का उजाला फैलाने वालों को रोकने की जगह, अगर उतनी ही ऊर्जा स्कूलों को सुधारने में लगाई जाए, तो शायद यह डर अपने आप ख़त्म हो जाए।
(स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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