बच्चियों की सुरक्षा
इलमा अज़ीम
बीते दिनों गोरखपुर में यूपी पुलिस का एक सिपाही 10 वर्षीय बच्ची के लिए हैवान बन गया। उसने न केवल दुष्कर्म किया बल्कि बच्ची की हत्या तक कर दी। इसी तरह बीती रात गाजियाबाद में एक मंदबुद्धि बच्ची से हैवानियत की गई। यह घटनाएं तो उदाहरण मात्र हैं। आए दिन इस तरह की घटनाओं के पुनरावृत्ति की खबरें सामने आती रहती है। देश में बढ़ते यौन शोषण, बलात्कार और हत्याओं जैसी दिल दहला देने वाली घटनाओं ने डर, भय और खौफ का वातावरण पैदा कर दिया है।
कुछ दिनों पूर्व राजस्थान के श्रीगंगानगर में तेरह वर्ष की मासूम बच्ची के साथ हुई दरिंदगी एवं पश्चिम बंगाल के बरुईपुर में बारह वर्ष की अबोध बेटी से बलात्कार और फिर हत्या मानवता को शर्मसार करने वाली है। इसी तरह पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी इलाके के एक निजी स्कूल में महज तीन वर्षीय बच्ची के साथ उसी स्कूल के 57 वर्षीय कर्मचारी द्वारा दुराचार की घटना मनुष्य की रुग्ण और विक्षिप्त मानसिकता को व्यक्त करती है। ये घटनाएं रूह को कंपकंपा देने वाली हैं।
ऐसा लगता है कि जैसे कि इनसान हैवान हो गया हो। अबोध बालिका की तकलीफ मानवता पर गंभीर प्रश्न है। धिक्कार है ऐसी घटिया मानसिकता पर। आज सारी मानवता शर्मसार है। बलात्कार और हत्या के मामलों को अक्षम्य अपराध की श्रेणी में लाया जाना समय की पुकार है। इन लोगों को कड़ी से कड़ी सजा देने के लिए सख्त कानून की आवश्यकता है।
बलात्कारी केवल बलात्कारी होता है। बलात्कारी की कोई जाति और धर्म नहीं होता। इन शैतानों को केवल मृत्युदंड ही अंतिम सजा होनी चाहिए। इन लोगों के साथ कोई भी लिहाज, क्षमा या दया याचना नहीं होनी चाहिए। आज पूरे देश में बच्चियों, बेटियों और महिलाओं की सुरक्षा एक यक्ष प्रश्न बन चुका है। ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान को चलाने वाली संस्थाओं और सरकारों को हर हाल में बिना शर्त उनकी सुरक्षा, आत्मसम्मान तथा बेखौफ जीवन सुनिश्चित करना होगा।





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