डिजिटल अतीत की बेड़ियों से मिले मुक्ति का अधिकार, वर्ल्ड कांग्रेस में बोले प्रो. आशीष कौशिक
सीसीएसयू के लीगल स्टडीज संस्थान के सहायक प्रोफेसर ने ‘भूल जाने के अधिकार’ को निजता और गरिमा से जोड़ा
मेरठ, 19 अगस्त। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू) के लीगल स्टडीज संस्थान के सहायक प्रोफेसर आशीष कौशिक ने ब्राजील के इटाउना विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित वर्चुअल वर्ल्ड कांग्रेस में भारत में ‘भूल जाने के अधिकार’ (Right to be Forgotten) के उभरते कानूनी आयाम पर व्याख्यान दिया। उन्होंने दुनिया भर के कानून विशेषज्ञों के समक्ष ‘भूल जाने का अधिकार: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार का एक उभरता आयाम’ विषय पर अपने विचार रखे।
प्रो. कौशिक ने कहा कि आधुनिक तकनीक की स्थायी डिजिटल स्मृति व्यक्ति की गरिमा, बदलती पहचान और व्यक्तिगत स्वायत्तता के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रही है। उनके अनुसार, इंसान के जीवन में गलतियों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन इंटरनेट पर मौजूद स्थायी डिजिटल रिकॉर्ड कई बार व्यक्ति को उसकी पुरानी गलतियों से जीवनभर जोड़कर रखते हैं।
दार्शनिक सिद्धांतों से लेकर आधुनिक डिजिटल कानून तक चर्चा
अपने व्याख्यान में प्रो. कौशिक ने रोस्को पाउंड, जॉन लॉक और इमैनुएल कांट के दार्शनिक विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि मानव विकास के लिए अतीत को भूलने और स्वयं को बदलने की क्षमता महत्वपूर्ण है। उन्होंने डिजिटल रिकॉर्ड के कारण उत्पन्न होने वाले सामाजिक कलंक और इसके व्यक्तिगत जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को रेखांकित किया।
उन्होंने यूरोपीय न्यायालय के वर्ष 2014 के चर्चित ‘गूगल स्पेन’ फैसले और यूरोपीय संघ के GDPR के अनुच्छेद 17 का उदाहरण देते हुए दुनिया में ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ से जुड़े कानूनी विकास की जानकारी दी।
भारत में निजता के अधिकार से जुड़ा महत्वपूर्ण आयाम
प्रो. कौशिक ने कहा कि के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता को मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया। इसके बाद भारत में डिजिटल डेटा संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।
उन्होंने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 का उल्लेख करते हुए डेटा हटाने, सहमति वापस लेने और डेटा न्यूनीकरण जैसे प्रावधानों पर चर्चा की।
निजता और प्रेस की स्वतंत्रता में संतुलन जरूरी
प्रो. कौशिक ने उच्च न्यायालयों के अलग-अलग फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘भूल जाने के अधिकार’ को लागू करते समय व्यक्ति की निजता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक महत्व और ऐतिहासिक रिकॉर्ड से जुड़े तथ्यों को मनमाने तरीके से हटाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
उन्होंने व्यावहारिक समाधान के तौर पर डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड के माध्यम से आनुपातिकता परीक्षण, दुर्भावनापूर्ण आवेदनों को रोकने के लिए मजबूत कानूनी प्रावधान और ऐतिहासिक अभिलेखों की सुरक्षा के लिए न्यायिक निगरानी में केंद्रीकृत ऑफलाइन डिपॉजिटरी बनाने जैसे सुझाव दिए।
‘नई शुरुआत का अवसर मिलना चाहिए’
अपने संबोधन के समापन पर प्रो. आशीष कौशिक ने कहा कि कानून और तकनीक का अंतिम उद्देश्य मानव गरिमा की रक्षा होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी गलतियों से सीखकर आगे बढ़ने, स्वयं को बदलने और जीवन में नई शुरुआत करने का अवसर मिलना चाहिए। उनके व्याख्यान को वर्ल्ड कांग्रेस में डिजिटल युग में निजता, डेटा संरक्षण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्वपूर्ण मुद्दों से जोड़कर देखा गया।


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