जलभराव की चुनौती



 राजीव त्यागी 

मानसून आते ही शहरों का जलमग्न होना अब एक आम बात हो गई है। यह केवल मौसम की चुनौती नहीं, बल्कि हमारे शहरी नियोजन की उस विफलता का परिणाम है, जिसमें कंक्रीट के जंगल तो खड़े कर दिए गए, लेकिन पानी की निकासी के प्राकृतिक रास्ते बंद कर दिए। हर वर्ष की बरसात यह साफ कर देती है कि शहर आसमान से बरसने वाले पानी में नहीं, बल्कि अपनी योजनाओं की कमियों और प्रशासनिक विफलताओं में डूबते हैं। कुछ घंटों की तेज बरसात हमारे तथाकथित आधुनिक शहरी नियोजन की तमाम कमजोरियों को उजागर कर देती है। 

सड़कें जलमग्न हो जाती हैं, यातायात थम जाता है, बाजारों में पानी भर जाता है और लोगों की दिनचर्या बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाती है। हर बरसात हमें एक बेहद असहज सच का आईना दिखाती है कि हमने शहरों का अंधाधुंध विस्तार तो किया, लेकिन उनकी बुनियादी क्षमता और जल निकासी अवसंरचना को उसी अनुपात में मजबूत नहीं किया। यही कारण है कि महज कुछ घंटों की बरसात पूरे शहरी ढांचे की नींव हिला देती है। 

दरअसल हमने कागजों पर शहरों का नक्शा तो बदल दिया, लेकिन पानी का मूल स्वभाव नहीं बदल सके। जहां कभी बड़े-बड़े तालाब और शहर का पानी बाहर ले जाने वाले प्राकृतिक नाले थे, वहां आज बहुमंजिला इमारतें और चमचमाती सड़कें खड़ी हैं। पानी अपनी पुरानी राह नहीं भूलता। हर वर्ष वह हमें कठोरता से याद दिलाता है कि प्रकृति के नियम इंसानों द्वारा बनाए गए मास्टर प्लान से नहीं बदलते। किसी भी आधुनिक शहर की असली ताकत केवल उसकी ऊंची इमारतों में नहीं, बल्कि उसकी सुदृढ़ जल निकासी व्यवस्था, हरित क्षेत्रों और प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण में निहित होती है। 

इन्हें नजरअंदाज करके किया गया विकास पहली ही तेज बरसात में अपनी कमजोरियां उजागर कर देता है। इस कुप्रबंधन का सबसे अधिक नुकसान आम नागरिक को उठाना पड़ता है। घंटों जाम में फंसा कर्मचारी, जलमग्न सड़कों के बीच अस्पताल पहुंचने के लिए संघर्षरत मरीज, प्रभावित छोटे व्यापारी और दिहाड़ी मजदूर, सभी इसकी भारी कीमत चुकाते हैं। अंडरपास में जलभराव से होने वाले हादसे आम हो गए हैं। इसके बाद डेंगू, मलेरिया और टाइफाइड जैसी जलजनित बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। आज जरूरत है इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाए।

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