पुरुषार्थ को साधो, बाकी सब भटकाव

- प्रो. नंदलाल

लोग तरक्की कर रहे हैं। सभी अपने अपने लक्ष्य को लेकर अहर्निश दौड़ लगा रहे हैं। कोई अपने लक्ष्य को साध लेता है तो कोई दौड़ता रहता है। आप किसी भी शहर के किसी भी चौराहे पर खड़ा हो जाइए और दो मिनट अपनी नजरों को चारों तरफ दौड़ाइए, पाएंगे कि चौराहा पार करने की जल्दी सभी को है।कोई अपनी गाड़ी को आगे पीछे कर रहा है तो पीछे वाला हॉर्न बजा रहा है, साइड वाला आगे बढ़ा जा रहा है तो कोई पैदल ही इधर से उधर हो रहा है।आखिर इतनी हड़बड़ी क्यों है। क्योंकि सभी को अपने लक्ष्य तक जल्दी पहुंचना है। और इसी जल्दी में कुछ और भी घटित हो जाता है।

इस भीड़ में कोई भी लक्ष्यहीन नहीं है। आखिरकार लक्ष्य क्या है लोगों का।लक्ष्य है जरूरतों की पूर्ति का। और जरूरतें क्या हैं, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यही सभी के जीवन का लक्ष्य है। कुछ इसे हमेशा मस्तिष्क में रखते हैं तो कोई इससे अंजान रहता है। लेकिन इन चार के अलावा जीवन का अन्य कोई लक्ष्य हो ही नहीं सकता। इसलिए इन्हीं को साधना सबसे अधिक जरूरी है और सब भटकाव है। लोग कहते हैं विकास हो रहा है,नवाचार हो रहा है, वैज्ञानिक खोजें हो रही हैं, प्रौद्योगिकी विकास हो रहा है। ठीक है सब हो रहा है लेकिन क्या ये पुरुषार्थ से अलग है नहीं यह भी मानव का ही पुरुषार्थ है।
     व्यष्टि और समष्टि की अनंत जरूरतें  हैं। विकासक्रम में इनकी जरूरत सभी को है पर बढ़ती जनसंख्या और उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन में गहरा अंतर है। इस लिए कृत्रिमता का सहारा लेना ही होगा। बिना कृत्रिमता के मानवीय जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं। इस दौड़ में लोग पुरुषार्थ के मूल सिद्धांत को ही भूल गए हैं और नैतिकता को ताख पर रखकर अंधाधुंध सरकारी और गैर सरकारी दोहन कर रहे हैं अमीर और गरीब की खाई अत्यधिक चौड़ी होती जा रही है। धन और संपदा कुछ व्यक्तियों के पास ही एकत्र हो रही है। हम लोग आज तक यही कहते चले आए कि विकसित देशों में बीस प्रतिशत आबादी के पास अस्सी प्रतिशत संसाधनों पर कब्जा है और अस्सी प्रतिशत आबादी बीस प्रतिशत संसाधनों पर गुजर बसर कर रही है।यही प्रवृत्ति भारत वर्ष में भी घुस चुकी है। अमीर और गरीब की आपसी खाई बढ़ रही है। यह भी उतनी चिंता की बात नहीं है।

चिंता तो इस बात की है कि जिस तरीके से ये धन को केंद्रीकृत कर रहे हैं वह पथ शोचनीय है। तो क्या वे पुरुषार्थ कर रहे हैं नहीं वे पुरुषार्थ का मार्ग नहीं चुने हैं वे तो उसी रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं जो जीवन के लक्ष्य को काल कोठरी तक पहुंचाता है।यदि चंद लोगों ने उसी को अपना मार्ग मान लिया है तो कोई क्या कर सकता है। अपने उपनिषदों में कहा भी गया है-----
  अविद्यायाम अन्तरे वर्तमाना
 स्वयं धीरा पंडित मान्यमाना
 दंडरभ्य माणा पर्यंत मूढ़।
  अंधे नैव नियमाना यथा अंधा
  जब व्यक्ति भौतिकता में डूब जाता है तो उस पर सांसारिक विद्या (अविद्या) हावी हो जाती है। उसे वर्तमान के अलावा और कुछ दिखता ही नहीं है। अपने को सबसे बड़ा विद्वान और पंडित मानने लगता है। उसके जैसा धैर्यशील दुनिया में कोई नहीं है। उस मूरख को यह नहीं मालूम पड़ता कि उसकी गति वही होने वाली है जो गति एक अंधे व्यक्ति के कंधे पर दूसरे अंधे के हाथ रखकर चलने वाले की होती है।
 
इसलिए जीवन के लक्ष्य को जानना बहुत जरूरी है। जो इसे समझ गया समझो उसका उद्धार हो गया और जो नहीं समझा उसे कई जन्मों तक यही करना पड़ेगा जो आज कर रहा है। वैश्विक स्तर पर भी यही विचारधारा बलवती होती रही है कि मनुष्य के जीवन का लक्ष्य शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति, प्यार, सुरक्षा, आत्म सम्मान और आत्म वास्तविकीकरण (आत्म पहचान) ही है। इसे प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मैस्लो ने समाज में फैलाया।ठीक उसी तरह भारतीय परिवेश में हमारे मुनियों, ऋषियों ने भी जीवन में चार पुरुषार्थों के सिद्धि की बात की। यदि पूर्व और पश्चिम में आवश्यकताओं को समझने की बात आती है तो हमारा पुरुषार्थ कही अधिक भारी पड़ता है। जहां पाश्चात्य में आत्म साक्षात्कार की बातें प्यार, भौतिक जरूरतों, सुरक्षा और आत्म सम्मान से होकर गुजरती हैं वहाँ पुरुषार्थ धन, और धर्म के रास्ते धन, धर्म, सृष्टि वहनीयता के रास्ते आत्म साक्षात्कार से कहीं आगे मोक्ष तक जाती है। अतः जीवन के लक्ष्य को साधने के लिए पुरुषार्थ को साधना बहुत जरूरी है वरना भटकाव और कुएं के अलावा कोई अन्य स्थान मिलने वाला नहीं है।
     जितनी भी भौतिकवादी जरूरतें हैं जो बड़ी जनसंख्या के उदर भरण के लिए आवश्यक हैं,उन्हें भी पुरुषार्थ के दायरे में लेकर कार्य किया जाय तो राष्ट्र की उन्नति गर्व महसूस कराएगी वरना छीना झपटी, रिश्वतखोरी, शोषण और व्यभिचार,शक्ति का दुरुपयोग, समाज में उथल पुथल और अंतर्द्वंद्व पैदा करेगा जो राष्ट्रहित में नहीं है।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)

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