पुरस्कार की चाह


- ललिता जोशी
पुरस्कार और प्रोत्साहन व्यक्ति के जीवन में उल्लास और उत्साह का संचार करते हैं । व्यक्ति बचपन से लेकर पचपन तक यानि बालपन से बुढ़ापे तक चाहता है की उसको पुरस्कार और प्रोत्साहन से पहचान और सम्मान मिलता है। प्राचीन काल से ही प्रोत्साहन और पुरस्कार चलन में रहे हैं । देव, दानव और ऋषि-मुनि अपने -अपने इष्ट की साधना करते थे । जब  उनके इष्ट उनकी साधना से प्रसन्न होते थे वो उन्हें पुरस्कार के रूप में वरदान देते थे । ऐसे ही राजा-महाराजाओं के समय में राजा जब अपने किसी दरबारी के काम से प्रसन्न होते थे तो वो पुरस्कार स्वरूप जमीन और हीरे-जवाहरात और सोने -चाँदी पुरस्कार में दिये जाते थे । राजशाही के साथ-साथ अंग्रेजों का पदार्पण हुआ तो उन्होने ने भी अपनी जड़ें जमाने के लिए यहां के लोगों को अपनी ओर मिला कर उनसे सूचना ली और बदले में उन्हें कुछ पुरस्कार दे देते थे । ये तो इन्सानों की प्रवृत्ति है कि उन्हें पुरस्कार की चाह होती है । पुरस्कार से उनका अहम भी संतुष्ट होता है ।

पुरस्कार से किसी भी योग्य व्यक्ति की प्रतिभा को देश -विदेश में पहचान मिलती है और लोगों से सम्मान मिलता है । ज्ञान -विज्ञान, कला, साहित्य, हथकरघा और खेल -कूद अन्य विधाओं जैसे लेखन, गायन, समाज सेवा, पर्यावरण, पशुओं की सेवा और अन्य बहुत से अनेक कार्यों  इत्यादि में पुरस्कार दिये जाते हैं । ये पुरस्कार देश और विदेश की सरकारें, निजी संस्थान और व्यक्तियों द्वारा प्रदान किए जाते हैं । पुरस्कार की चाह किसे नहीं होती । पुरस्कार पुरस्कृत व्यक्ति की प्रतिभा को विश्व के समक्ष लाता है। पुरस्कृत व्यक्ति भी स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है । चाहे वो नोबेल पुरस्कार हो या अन्य अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कार।
 
पुरस्कारों की घोषणा होते ही आलोचनाएँ भी शुरू हो जाती हैं खासकर साहित्य के क्षेत्र में पुरस्कारों के लिए चयनित किए गए व्यक्तियों का चयन पक्षपातपूर्ण होता है । हमारे कई मित्र हैं जो पुरस्कृत व्यक्ति को बधाई देने की जगह उसकी आलोचना करेंगे और कमियाँ निकाल कर दावा ठोकते हैं कि इनसे बेहतर अन्य लेखक थे जो इस पुरस्कार के पात्र बन सकते थे । अरे भई एक कमेटी बैठती है पात्र व्यक्तियों के चयन के लिए । तब कहीं जाकर पुरस्कारों की घोषणा की जाती है । अरे बड़े राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से वंचित रह गए  तो क्या हुआ ?

अब तो बहुत से पुरस्कार हैं और बहुत सी संस्थाएं हैं लेखकों को पुरस्कार देने के लिए । इसीलिए प्रिय लेखकों आप को हतोत्साहित होने की आवश्यकता है न ही आलोचना करने की । देखिये अब तो पुरस्कार इतने हैं कि काबिल लेखक को पुरस्कार मिल जाता है । कुछ नहीं तो हम -तुम  को देखें और तुम - हम को देखो। हम- तुम चलता रहे तो बहुत से लेखकों  का भला हो जाता है । पुरस्कार की चाहत लेखकों को होती है ताकि वो गर्व महसूस कर सकें । चलते -चलते एक बहुत प्रसीध कविता याद आ गई । जो हम से अधिकांश को याद होगी । वो इस प्रकार है :
पुष्प की अभिलाषा
चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ ।
चाह नहीं, प्रेमी -माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ ॥
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरी, डाला जाऊँ ।
....मुझे तोड़ लेना वनमाली ! उस पथ में देना तुम फेंक ।
मातृ -भूमि पर शीश चढ़ने, जिस पथ जावें वीर अनेक ॥
मगर अब हम लेखकों की  स्थिति है
‘लिखना है मुझे पुरस्कार के लिए
चाह है मुझे पुरस्कार की लिखता जाऊँ मैं
पुरस्कार पाता जाऊँ’
एक लेखक की चाहत को एक लेखक ही जान सकता है ।
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)

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