पुड़िया पर प्रतिबंध : क्या कानून आदत को हरा सकता है?

- रविकान्त राऊत
किसी आदमी की जेब में रखी तंबाकू की छोटी-सी पुड़िया को देखकर शायद ही कोई अंदाजा लगा सके कि उसमें कितनी बड़ी कहानी छिपी है। वह पुड़िया सिर्फ तंबाकू नहीं है। उसमें किसी मजदूर की थकान हो सकती है, किसी ड्राइवर की रात हो सकती है, किसी दुकान पर बैठे आदमी की ऊब हो सकती है, दोस्तों के बीच शुरू हुआ पहला प्रयोग हो सकता है, किसी किशोर की नकल हो सकती है और किसी ऐसे व्यक्ति की लत भी, जो कई बार छोड़ने का फैसला कर चुका है लेकिन हर बार लौट आया है।

इसीलिए तंबाकू से लड़ाई केवल स्वास्थ्य की लड़ाई नहीं है। यह आदत, बाजार, मनुष्य की कमजोरी और राज्य की शक्ति - इन चारों के बीच की लड़ाई है। कर्नाटक ने हाल में गुटखा, पान मसाला और तंबाकू या निकोटीन वाले ऐसे उत्पादों पर एक वर्ष का प्रतिबंध लगाया है। प्रतिबंध केवल बिक्री तक सीमित नहीं है; निर्माण, भंडारण, परिवहन और वितरण भी इसके दायरे में हैं।

यह फैसला सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से स्वागतयोग्य है। तंबाकू का नुकसान अब किसी बहस का विषय नहीं रह गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार तंबाकू शरीर के लगभग हर अंग को नुकसान पहुंचाता है और दुनिया में हर वर्ष 70 लाख से अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार है। भारत में स्थिति और गंभीर है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लगभग 26.7 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का उपयोग करते हैं। देश में हर वर्ष लगभग 13.5 लाख मौतें तंबाकू से जुड़ी मानी जाती हैं।

लेकिन यहीं से असली सवाल शुरू होता है कि  क्या तंबाकू को दुकान से हटाने से वह आदमी के जीवन से भी हट जाएगा? भारत का अनुभव बताता है कि कानून का असर तो होता है। राष्ट्रीय वयस्क तंबाकू सर्वेक्षण के अनुसार 2009-10 से 2016-17 के बीच भारत में तंबाकू के किसी भी रूप के उपयोग का अनुपात 34.6 प्रतिशत से घटकर 28.6 प्रतिशत हुआ। लगभग 81 लाख लोगों ने तंबाकू का इस्तेमाल छोड़ दिया अर्थात कानून, चेतावनी, कर, विज्ञापन पर रोक और सार्वजनिक स्थानों पर नियंत्रण बेअसर उपाय नहीं हैं , लेकिन यह भी उतना ही सच है कि तंबाकू की लत केवल उपलब्धता की समस्या नहीं है।

निकोटीन आदत को जैविक मजबूती देता है
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी मानता है कि निकोटीन अत्यधिक व्यसनकारी है और उसे छोड़ना केवल इच्छाशक्ति का मामला नहीं है। भारत की तंबाकू छोड़ने की राष्ट्रीय हेल्पलाइन के आंकड़ों में भी परामर्श और लगातार सहायता की भूमिका सामने आती है। इसलिए अगर राज्य किसी व्यक्ति से कहता है “तंबाकू छोड़ दो” तो उसके साथ अगला वाक्य भी होना चाहिए “हम तुम्हें छोड़ने में मदद करेंगे।” यहीं हमारी नीतियां अक्सर कमजोर पड़ जाती हैं।हम विक्रेता को देखते हैं, लती को नहीं ।
तंबाकू नियंत्रण की तस्वीर में सामान्यतः दो पात्र दिखाई देते हैं - बेचने वाला और खरीदने वाला। लेकिन इनके बीच एक तीसरा पात्र भी है - लत। लत दिखाई नहीं देती, मगर वही सबसे शक्तिशाली है। एक व्यक्ति जिसने दस वर्षों से तंबाकू खाया है, उसके लिए दुकान बंद कर देना समस्या का अंत नहीं, एक नई शुरुआत है। वह दूसरा रास्ता खोज सकता है। दूसरा उत्पाद ले सकता है। कीमत बढ़ने पर सस्ता विकल्प चुन सकता है। प्रतिबंधित वस्तु अवैध बाजार से प्राप्त कर सकता है। यही कारण है कि केवल प्रतिबंध की सफलता को दुकानों की संख्या से नहीं, उपयोग की मात्रा और लोगों के स्वास्थ्य से मापा जाना चाहिए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन तंबाकू नियंत्रण के लिए केवल प्रतिबंध नहीं, बल्कि कर और कीमत बढ़ाने, धूम्रपान-मुक्त वातावरण, विज्ञापन पर रोक और तंबाकू छोड़ने में सहायता जैसी संयुक्त रणनीति की वकालत करता है। उसका कहना है कि तंबाकू पर प्रभावी कर और कीमत बढ़ाना खपत घटाने के सबसे प्रभावी और लागत-कुशल उपायों में है अर्थात लड़ाई का रास्ता एक दरवाजे से नहीं जाता। तंबाकू को महंगा भी करना होगा, कम दिखाई देने वाला भी, कम उपलब्ध भी और छोड़ने वाले के लिए कम कठिन भी।
जहां एक पुड़िया के पीछे पूरा बाजार खड़ा हो वहाँ राज्य के सामने एक कठिन विरोधाभास भी होता है। तंबाकू स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, लेकिन उससे जुड़ा उद्योग रोजगार, खेती, व्यापार और कर राजस्व से भी जुड़ा है। कर्नाटक में प्रतिबंध के बाद कुछ सहकारी और कृषि हितधारकों ने यह सवाल उठाया है कि ऐसे फैसलों का असर सुपारी और उससे जुड़े कारोबारों पर किस सीमा तक पड़ेगा। इसलिए नीति का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।
तंबाकू की अर्थव्यवस्था को अचानक खत्म करना नहीं, बल्कि धीरे-धीरे ऐसी अर्थव्यवस्था बनाना जिसमें किसान, मजदूर और छोटे व्यापारी किसी हानिकारक उत्पाद पर निर्भर न रहें। किसान से यह कहना आसान है कि तंबाकू मत उगाओ। लेकिन बदले में उसे बताना होगा कि क्या उगाओ? दुकानदार से यह कहना आसान है कि यह उत्पाद मत बेचो , लेकिन फिर सवाल है -उसकी आय का विकल्प क्या है?

यही वह जगह है जहाँ अच्छी नीति और अच्छी घोषणा के बीच फर्क पैदा होता है। हमारे यहां प्रतिबंध लगाना अक्सर आसान है। उसका पालन कराना कठिन। कानून,  किताब में बहुत साफ हो सकता है, लेकिन बाजार हमेशा कानून की भाषा में नहीं चलता। यदि मांग बनी रहती है तो बाजार आपूर्ति का नया रास्ता खोज लेता है। यही वजह है कि तंबाकू नियंत्रण में केवल छापे और जुर्माने को सफलता का पैमाना बनाना पर्याप्त नहीं होगा।
कर्नाटक का यह प्रयोग तभी सफल माना जाएगा जब एक वर्ष बाद तीन बातें दिखाई दें - तंबाकू की खपत घटी हो, नए उपभोक्ताओं, विशेषकर युवाओं, की संख्या कम हुई हो और पुराने उपभोक्ताओं में छोड़ने की दर बढ़ी हो। सिर्फ यह बताना कि कितनी दुकानों पर कार्रवाई हुई, पर्याप्त नहीं होगा।

कानून की सफलता उस दिन होगी जब तंबाकू बेचने वाले की दुकान नहीं, तंबाकू खरीदने वाले की इच्छा छोटी होने लगे। क्योंकि असली लड़ाई किशोर के हाथ में है।तंबाकू की सबसे बड़ी चिंता केवल आज का उपभोक्ता नहीं है। वह किशोर है जो आज पहली बार इसे हाथ में ले रहा है। जिस बच्चे ने घर में पिता को तंबाकू खाते देखा है, सड़क पर दुकान पर रंगीन पुड़ियां देखी हैं और फिल्मों या सामाजिक वातावरण में इसे सामान्य व्यवहार की तरह देखा है, उसके सामने केवल यह कह देना कि “तंबाकू स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है” शायद पर्याप्त नहीं। उसे यह भी समझना होगा कि लत स्वतंत्रता नहीं है। किसी चीज को अपनी इच्छा से शुरू करना स्वतंत्रता हो सकती है। लेकिन जब वही चीज छोड़ने की इच्छा के बावजूद छोड़ी न जा सके, तो वह स्वतंत्रता नहीं रहती।

राज्य व्यक्ति की जिंदगी में कितना प्रवेश करे? यहीं तंबाकू नीति का सबसे कठिन नैतिक प्रश्न खड़ा होता है। यदि कोई वयस्क व्यक्ति जानता है कि तंबाकू हानिकारक है, फिर भी उसका सेवन करना चाहता है, तो क्या राज्य को उसे रोकने का अधिकार है? उदार समाज में यह प्रश्न गंभीर है। राज्य व्यक्ति की हर गलत पसंद पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता। लोग अस्वास्थ्यकर भोजन खाते हैं, कम सोते हैं, जोखिम भरे काम करते हैं, वाहन तेज चलाते हैं। हर जोखिम को कानून से समाप्त करना संभव नहीं।

लेकिन तंबाकू का मामला अलग है। क्योंकि यह केवल एक क्षणिक पसंद नहीं है। इसमें व्यसन की क्षमता है, दूसरे लोगों पर धुएं का प्रभाव है, स्वास्थ्य-व्यय का सामाजिक बोझ है और युवाओं को आकर्षित करने वाला बाजार भी है। इसलिए राज्य का हस्तक्षेप उचित है,. लेकिन उसकी सीमा और तरीका दोनों महत्वपूर्ण हैं।राज्य का काम केवल नागरिक को डराना नहीं, उसकी स्वतंत्रता को बचाना भी है, उस स्वतंत्रता को, जिसमें वह किसी लत का गुलाम न हो।

कर्नाटक का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह हमें तंबाकू के बारे में एक असुविधाजनक सत्य के सामने खड़ा करता है। हम तंबाकू पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। लेकिन क्या हम उस अकेलेपन पर प्रतिबंध लगा सकते हैं जिसमें आदमी तंबाकू की ओर जाता है? क्या हम उस काम की थकान को कम कर सकते हैं जिसमें बीड़ी पांच मिनट की राहत बन जाती है? क्या हम उस सामाजिक दबाव को रोक सकते हैं जिसमें पहला कश दोस्ती का प्रमाण बन जाता है? क्या हम उस बाजार को रोक सकते हैं जो जानता है कि आज का किशोर कल का स्थायी ग्राहक हो सकता है? और क्या हम उस व्यक्ति को पर्याप्त सहारा दे सकते हैं जो सचमुच छोड़ना चाहता है?

भारत ने तंबाकू नियंत्रण में प्रगति की है। खपत में गिरावट इसका प्रमाण है। लेकिन लगभग 26.7 करोड़ वयस्कों का तंबाकू इस्तेमाल करना बताता है कि मंजिल अभी बहुत दूर है। इसलिए तंबाकू के खिलाफ हमारी अगली लड़ाई प्रतिबंध बनाम स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं होनी चाहिए। यह लड़ाई लत बनाम स्वतंत्रता की होनी चाहिए।

क्योंकि आखिरकार किसी आदमी के हाथ से तंबाकू की पुड़िया छीन लेना बड़ी उपलब्धि नहीं है। बड़ी उपलब्धि तब होगी जब एक दिन वह आदमी उसी पुड़िया को देखकर खुद कहे - “मुझे इसकी जरूरत नहीं है।” उस दिन कानून ने केवल बाजार को नहीं बदला होगा। उस दिन कानून ने एक मनुष्य को उसकी अपनी जिंदगी वापस की होगी।
(जबलपुर, मध्यप्रदेश)

No comments:

Post a Comment

Popular Posts