मिलावटखोरी से निजात कब?
 इलमा अज‍़ीम 
मिलावटखोरी की समस्या अब हमारे देश की सबसे बड़ी भयावह समस्या बनती जा रही है, जिस पर रोक लगाने के लिए अब बड़े स्तर पर कदम उठाए बिना कोई बात नहीं बनेगी। देश में कानून भी है, नियम भी है, निगरानी के लिए विभाग भी है और अधिकारी भी है लेकिन फिर भी ऐसा लगता है कि मिलावटखोरों को किसी भी बात का कोई डर ही नहीं है। 

लोगों के घरों से लेकर, फ़ास्ट फ़ूड, शादी-ब्याह और पार्टियों तक में सबसे ज्यादा पनीर का इस्तेमाल किया जाता है। कई एक्सपर्ट/ जिम ट्रेनर तो बॉडी को मजबूत बनाने के लिए भी पनीर खाने की सलाह देते हैं। लेकिन पनीर में मैदा या अरारोट मिलाना और स्किम्ड मिल्क पाउडर एवं वनस्पति तेल का इस्तेमाल कर सिंथेटिक या नकली पनीर बनाना तो आम बात हो गई है। बल्कि ऐसे गंभीर मामले भी कई बार सामने आए हैं, कि डिटर्जेंट या यूरिया से बने दूध का भी इस्तेमाल कर पनीर बनाया और बेचा जाता है।
 महाराष्ट्र सरकार ने कुछ दिन पहले ही, राज्य में एनालॉग पनीर यानी नॉन डेयरी पनीर के निर्माण, बिक्री, भंडारण, परिवहन और वितरण पर यह कहते हुए प्रतिबंध लगा दिया कि असली पनीर बताकर इसे बेचना उपभोक्ताओं को गुमराह करना है। इससे पहले छत्तीसगढ़ सरकार भी एनालॉग पनीर यानी नॉन डेयरी पनीर को लेकर ऐसा ही फैसला कर चुकी है।


 सबसे अधिक दुःखद और परेशानी में डालने वाला तथ्य तो यह है कि देश की नामी-गिरामी कंपनियां भी उपभोक्ताओं को धोखा देने का कोई मौका नहीं चूकती है। लोग पैसे खर्च करने को तैयार हैं ताकि उन्हें शुद्ध आटा, दाल, चावल, मसाले, चीनी, दूध, घी, खाद्य तेल, सब्जियां, पनीर, शहद, पानी और अन्य सामान मिल सके। लेकिन ज्यादा खर्च के बाद भी उनके साथ न केवल ठगी की जा रही है बल्कि लोग गंभीर बीमारियों के भी शिकार होकर मरते भी जा रहे हैं। इसको लेकर नए सिरे से सोचने की जरूरत है।

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