लापरवाही पर अंकुश जरूरी

इलमा अज़ीम 
दिल्ली-एनसीआर में पिछले दो दिनों से हो रही बारिश से लोग बेहाल हैं। जगह-जगह हुए जलभराव से जहां लोग परेशान हैं, वहीं इस जलभराव ने सरकारी व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। बात चाहे गुरुग्राम की करें या फिर राजधानी दिल्ली के कनाट प्लेस की हर जगह जलजमाव से लोगों को परेशान होना पड़ा। ऐसे में सवाल है कि क्या हर बार की बाढ़ व जलभराव समस्या हमारी व्यवस्था की लापरवाही या भ्रष्टाचार है? जहां हर वर्ष नालों की सफाई के नाम पर पैसा खर्च होता है, लेकिन अगली बारिश में वही नाले फिर जाम मिलते हैं। 

जल निकासी की परियोजनाएं बार-बार बनती हैं, लेकिन जलभराव खत्म नहीं होता, वहां काम की गुणवत्ता और खर्च की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? आज सबसे बड़ा सवाल है कि जलभराव के बाद राहत क्यों, संकट आने से पहले तैयारी क्यों नहीं होती? अधिकांश शहरी जलभराव अचानक पैदा होने वाली समस्या नहीं है। जिन स्थानों पर हर वर्ष पानी भरता है, उनकी पहचान प्रशासन और नगर निकायों को पहले से होती है। यह भी पता होता है कि किस सड़क पर पानी जमा होता है, किस नाले की क्षमता कम है और कहां प्राकृतिक जल निकासी बाधित है। फिर भी हमारा जोर अक्सर पानी भरने के बाद राहत देने पर रहता है, पानी भरने से पहले समस्या रोकने पर नहीं। 

हरियाणा की आर्थिक शक्ति गुरुग्राम और देश के प्रमुख कारोबारी केंद्रों में शामिल इस शहर में लाखों लोग काम करते हैं। लेकिन मानसून आते ही कई बार इसकी तस्वीर बदल जाती है। भारी बारिश के बाद सड़कें पानी में डूबती हैं, वाहन घंटों फंसते हैं, सार्वजनिक परिवहन प्रभावित होता है और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी रुक जाती है। हर वर्ष नालों की सफाई, पंपों की व्यवस्था और जल निकासी के इंतजाम किए जाते हैं। फिर अगले मानसून में वही स्थान दोबारा पानी में दिखाई देते हैं। इस समस्या से दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, जयपुर और देश के अनेक शहर हर वर्ष सामना करते हैं। 

हमने शहरों का विस्तार तो कर दिया, लेकिन पानी के लिए जगह नहीं छोड़ी। तालाब, झील और प्राकृतिक जल क्षेत्र खाली जमीन नहीं, बल्कि शहरों की प्राकृतिक बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था हैं। सवाल है कि क्या हर बार की बाढ़ व जलभराव समस्या हमारी व्यवस्था की लापरवाही या भ्रष्टाचार है? जहां हर वर्ष नालों की सफाई के नाम पर पैसा खर्च होता है, लेकिन अगली बारिश में वही नाले फिर जाम मिलते हैं। जल निकासी की परियोजनाएं बार-बार बनती हैं, लेकिन जलभराव खत्म नहीं होता, वहां काम की गुणवत्ता और खर्च की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? 


अगर किसी अधिकारी, ठेकेदार या एजेंसी की लापरवाही से सार्वजनिक धन खर्च होने के बावजूद समस्या बनी रहती है, तो जवाबदेही किसकी होगी? भ्रष्टाचार और लापरवाही पर सख्त कार्रवाई जरूरी है। निर्माण कार्यों में पारदर्शिता, स्वतंत्र गुणवत्ता जांच और प्राकृतिक जल मार्गों पर अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। मानसून से पहले नालों की सफाई भी औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। 

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