खाद्य मिलावट पर हो प्रहार
इलमा अज़ीम
जिस खाद्य सामग्री को हम अपने परिवार, बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य का आधार मानकर खरीदते हैं, यदि वही मिलावटी, दूषित या अस्वच्छ निकले तो यह महज उपभोक्ता के साथ धोखा नहीं, बल्कि मानव जीवन के साथ खिलवाड़ है। हालांकि हमारे देश में खाद्य सुरक्षा के लिए कानून भी है, नियामक संस्थाएं भी हैं, निरीक्षण की व्यवस्था भी है और प्रयोगशालाएं भी, लेकिन फिर भी मिलावटखोरों के हौसले बुलंद हैं। लिहाजा खाद्य मिलावट पर अब ऐसा प्रहार जरूरी है, जिसकी चोट मिलावट करने वालों तक स्पष्ट रूप से पहुंचे। मिलावट की समस्या अब दूध में पानी या मसालों में कृत्रिम रंग मिलाने तक सीमित नहीं रही।
दूध और दुग्ध उत्पाद, खाद्य तेल, मसाले, मिठाइयां, अनाज, दालें, शहद और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठते रहते हैं। गलत लेबलिंग, भ्रामक विज्ञापन, अनुचित भंडारण, दूषित पानी और अस्वच्छ परिस्थितियों में खाद्य पदार्थ तैयार करना भी खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2026 में जारी नई वैश्विक गणना इस खतरे की भयावहता को सामने रखती है। वर्ष 2021 में असुरक्षित भोजन के कारण दुनिया में लगभग 86.6 करोड़ लोग बीमार हुए और करीब 15.2 लाख लोगों की मृत्यु हुई। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे इसके सबसे संवेदनशील वर्गों में हैं। असुरक्षित भोजन से 200 से अधिक बीमारियां जुड़ी हैं। वर्तमान कानून में असुरक्षित भोजन के लिए गंभीर दंड का प्रावधान है।
धारा 59 के अनुसार असुरक्षित खाद्य पदार्थ से किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर दोषी को कम से कम सात वर्ष के कारावास से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा और कम से कम दस लाख रुपए के जुर्माने का प्रावधान है। स्पष्ट है कि कानून कमजोर नहीं है, कमजोर कड़ी उसके क्रियान्वयन में दिखाई देती है। आज आवश्यकता है, नमूना लेने से लेकर प्रयोगशाला में जांच, रिपोर्ट प्राप्त करने, अभियोजन और दोषसिद्धि तक की प्रक्रिया को तेज करना होगा। आधुनिक प्रयोगशालाओं की संख्या और क्षमता बढ़ानी होगी। प्रशिक्षित खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की कमी दूर करनी होगी।
जोखिम आधारित नमूना जांच को बढ़ावा देना होगा और बार-बार नियम तोड़ने वाले कारोबारियों पर विशेष निगरानी रखनी होगी। गंभीर मामलों में आर्थिक दंड के साथ आपराधिक कार्रवाई सुनिश्चित होनी चाहिए। कार्रवाई ऐसी हो कि छोटे व्यापारी पर अनावश्यक दबाव न पड़े, लेकिन बड़े कारोबारी, प्रभावशाली संस्थान या बार-बार नियम तोडऩे वाला व्यक्ति कानून की पकड़ से बच भी न सके।
आखिरकार सुरक्षित भोजन कोई विलासिता नहीं, नागरिक का बुनियादी अधिकार है। देश की थाली को सुरक्षित रखना सरकार, कारोबारी और उपभोक्ता- तीनों की साझा जिम्मेदारी है। अब जरूरत केवल छापेमारी और आंकड़े जारी करने की नहीं, बल्कि ऐसी प्रभावी व्यवस्था बनाने की है जिसमें मिलावट की संभावना कम हो।





No comments:
Post a Comment