सेहत-सुरक्षा जरूरी
इलमा अज़ीम
मानसून के सीजन में इस समय महानगरों की सड़कों व सार्वजनिक स्थलों में पसरा कचरा लोगों की सेहत से खिलवाड़ कर रहा है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि इस कचरे को हटाना हमारी प्राथमिकता नहीं बनता। यदि मानसून के सीजन में भी कचरा नहीं उठाया जाता तो स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है। बारिश में इस कचरे के बहने से नालियां जाम हो जाती हैं। वहीं पानी के स्रोत भी दूषित हो सकते हैं।
साथ ही मच्छर,चूहे व कीट-पतंगे पनपने से बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। नगर निगम और पब्लिक सिविक से जुड़ा विभागों को लोगों की सेहत से सीधे जुड़ी सेवाओं के लिये आपातकालीन योजनाएं बनानी ही चाहिए। निस्संदेह, इस संकट को महज कानून व व्यवस्था के नजरिये से ही नहीं देखा जा सकता। निर्विवाद रूप से हमारे समाज में सफाई कर्मचारियों की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन इस अहम कार्य को हम अपेक्षित मान्यता नहीं देते। यह विडंबना ही है कि सफाई कर्मचारी लंबे समय से नौकरी की असुरक्षा, स्थायी होने में लगने वाली देरी, मिलने वाला कम वेतन और काम करने की खराब स्थितियों की शिकायत करते रहते हैं।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सफाई कर्मचारियों को उनका वाजिब हक मिलना चाहिए। लेकिन हड़ताल व स्वास्थ्य सेवाओं का ठप होना न तो लोगों के हित में है और न ही सफाईकर्मियों के हक में। भारत में हर रोज 1.7 लाख टन से ज्यादा ठोस कचरा विभिन्न नगरपालिकाओं के अंतर्गत पैदा होता है। लेकिन तीव्र गति से बढ़ते शहरीकरण के चलते नागरिक सेवाओं पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में इस चुनौती के मुकाबले के लिये आधुनिक तकनीक के साथ प्रोफेशनल तरीके से ठोस कचरे का निस्तारण होना चाहिए।
साथ ही जरूरी है कि पर्याप्त स्टाफ मिले, सफाई के आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराये जाएं। इसके अलावा इस क्षेत्र में निरंतर निवेश बढ़ाया जाए। हमारे नीति-नियंताओं को सोचना चाहिए कि आपातकाल के समय की गई कोई भी कार्रवाई लंबी अवधि की योजना का विकल्प नहीं बन सकती।
इसके अलावा आपातकालीन इंतजामों के जरिये साफ-सफाई से जुड़ी सेवाएं निर्बाध रूप से जारी रहनी चाहिए। विभागीय कर्मियों के विवाद के चलते आम लोगों की सेहत को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। जरूरत तो इस बात की है कि साफ-सफाई को एक जरूरी जन सेवा के तौर पर मान्यता देने का उपक्रम करना चाहिए।





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