ऊर्जा में आत्मनिर्भरता
राजीव त्यागी
ऊर्जा किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और विकास की आधारशिला होती है। युद्ध अथवा वैश्विक भू-राजनीतिक संकट के समय ऊर्जा की निर्बाध उपलब्धता खाद्य सुरक्षा और रक्षा आपूर्ति जितनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, फिर भी वह अपनी तेल और गैस आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है। ऐसी स्थिति में यदि अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो जाएं, तो देश की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
इतिहास साक्षी है कि युद्ध और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के दौरान ऊर्जा बाजारों में भारी अस्थिरता उत्पन्न होती है। तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि, आपूर्ति में बाधा तथा परिवहन मार्गों के अवरुद्ध होने से ऊर्जा आयात करने वाले देशों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस संदर्भ में वेस्ट टू एनर्जी तकनीक भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता और ऊर्जा संप्रभुता की दिशा में आगे बढ़ाने का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है। यह तकनीक ठोस अपशिष्ट, कृषि अवशेषों और जैविक कचरे को बिजली, बायोगैस, ऊष्मा तथा जैव-ईंधन में परिवर्तित करती है। इससे एक ओर कचरा प्रबंधन की समस्या का समाधान होता है, वहीं दूसरी ओर घरेलू ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि होती है।
यह ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का एक बेहद प्रभावी और आधुनिक तरीका है, जो कचरे के पहाड़ों को कम करने के साथ-साथ हमारी ऊर्जा जरूरतों को भी पूरा करता है। वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए भारतीय उद्योगों को भी हरित इस्पात उत्पादन जैसी पर्यावरण हितैषी तकनीकें अपनानी होंगी, जैसे कि यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख निर्यात बाजार ने कार्बन निरपेक्षता के लिए प्रतिबद्धता जताई है। इंडिया एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर की ‘पाथवेज टू आत्मनिर्भर भारत’ शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में संक्रमण का कर राजस्व पर बहुत ही कम प्रभाव पड़ने का अनुमान है।
फिलहाल जीवाश्य ईंधन पर टैक्स, ड्यूटी और रायल्टी का केंद्र और राज्य सरकारों के राजस्व में 12 प्रतिशत का योगदान है। स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों की ओर आक्रामक रूप से जोर दिए जाने के बावजूद 2030 के मध्य तक जीवाश्म ईंधन उपभोग और उससे संबंधित कर राजस्व के 2020 के स्तर से नीचे जाने के आसार नहीं हैं। यह अनुमान अक्षय ऊर्जा की दिशा में भारत के झुकाव की दीर्घकालिक व्यावहार्यता और कहीं अधिक टिकाऊ एवं आर्थिक रूप से सशक्त भविष्य की ओर रेखांकित करता है।





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