प्रेमचंद ने हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक यथार्थ को साहित्य का आधार बनाया : प्रो. तारिक छतारी
मेरठ, 30 जुलाई। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग एवं आयुसा के संयुक्त तत्वावधान में "प्रेमचंद : फ़िक्र-ओ-फ़न के आईने में" विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने मुंशी प्रेमचंद के साहित्य, उनकी सामाजिक दृष्टि और हिंदी-उर्दू साहित्य में उनके योगदान पर विस्तार से विचार रखे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. तारिक छतारी ने की। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद पर नए सिरे से गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद को केवल राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं के लेखक के रूप में सीमित करना उचित नहीं है। उन्होंने अरबी और फ़ारसी का अध्ययन किया था तथा सरल और सहज भाषा में प्रतीकों एवं रूपकों के माध्यम से समाज की जटिल समस्याओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर विशेष बल दिया और समाज की वास्तविकताओं को निष्पक्ष रूप से सामने रखा। वे दलितों के विरोधी नहीं थे, बल्कि सामाजिक सच्चाइयों को उजागर करना उनका उद्देश्य था।
मुख्य वक्ता प्रो. सगीर अफ़राहीम ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य देशभक्ति, राष्ट्र-समर्पण और सामाजिक यथार्थ का सशक्त दस्तावेज है। उन्होंने अपने पात्रों और संवादों के माध्यम से समाज की वास्तविकताओं को प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने कभी भी उग्रता का मार्ग नहीं अपनाया। उनकी भाषा में उर्दू, फ़ारसी और ग्रामीण बोलियों का सहज समन्वय दिखाई देता है, जिसके कारण उनका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना अपने समय में था।
प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. असलम जमशेदपुरी ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद अपने समय के महान साहित्यकार थे और आज भी उनकी रचनाएँ समान रूप से प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने उर्दू कथा-साहित्य को गाँव-गाँव तक पहुँचाने का कार्य किया और वे हिंदी तथा उर्दू दोनों भाषाओं के साझा साहित्यकार हैं। उर्दू और हिंदी के विकास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आयुसा की अध्यक्ष प्रो. रेशमा परवीन ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियाँ "दो बैलों की कथा", "कफ़न" तथा उपन्यास "निर्मला" और "गोदान" भारतीय ग्रामीण जीवन और सामाजिक समस्याओं का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने इस संगोष्ठी को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद ने पवित्र कुरआन के पाठ से किया। स्वागत भाषण मोहम्मद ज़ुबैर ने दिया, जबकि संचालन सैयदा मरियम इलाही ने किया। लिमरा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर मोहम्मद ईसा राना ने "प्रेमचंद की समकालीन प्रासंगिकता" विषय पर अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया।
ऑनलाइन आयोजित इस कार्यक्रम में डॉ. आसिफ अली, डॉ. इरशाद स्यानवी, फरहत अख्तर, मोहम्मद शमशाद सहित अनेक शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएँ भी शामिल रहे।


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