महंगी होती शिक्षा

 इलमा अज़ीम 
  पिछले कुछ वर्षों से देश में उच्च शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है। गरीब, मेहनतकश वर्ग ही नहीं, मध्यवर्ग के लिए भी हायर एजुकेशन हासिल करना आसान नहीं रह गया है। महंगी शिक्षा के कारण अधिकांश छात्रों को बड़ा एजुकेशन लोन लेना पड़ता है, जिसकी अदायगी के लिए वे करियर की शुरुआत में ही कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों को बच्चों को पढ़ाने के लिए अपनी संपत्ति गिरवी रखनी पड़ती है या अपनी बचत खत्म करनी पड़ती है। उच्च फीस और जीवनयापन के भारी खर्चों (हॉस्टल, यात्रा, कोचिंग) के कारण कई मेधावी छात्र बीच में ही पढ़ाई छोडऩे को मजबूर हो जाते हैं।
हाल तक यह माना जाता था कि कम से कम सरकारी संस्थानों में तो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पढ़ाई कर ही लेगा, पर उन संस्थानों की भी बढ़ती फीस ने इस तबके की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। इस वर्ग के लिए तो प्राथमिक शिक्षा का खर्च उठाना भी कठिन होता जा रहा है। यह भारत के लिए एक बड़ी त्रासदी ही कही जाएगी, जहां दुनिया की सबसे युवा आबादी रहती है। देश के प्रमुख चार आईआईएम की सालाना औसत फीस 25 लाख रुपए से ज्यादा है। जब सरकारी संस्थानों का यह हाल है तो निजी संस्थानों के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है।
 एक तो केंद्रीय विश्वविद्यालयों और आईआईटी-आईआईएम जैसी संस्थाओं की संख्या इतनी कम है कि कुछ चुनिंदा छात्र ही इन तक पहुंच पाते हैं।  एक बड़ा हिस्सा इन संस्थानों की दौड़ से पहले ही बाहर हो जाता है। कुछ साल पहले तक फीस इत्यादि कम होने की वजह से कुछेक ग्रामीण और कस्बाई छात्र अपनी प्रतिभा और संघर्ष के बल पर ऐसे संस्थानों में किसी न किसी तरह पहुंच ही जाते थे। लेकिन अब तो इसकी संभावना बेहद कम होती जा रही है। हमारी उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम, परीक्षा और परिणामों का स्वरूप कुछ ऐसा हो गया है कि अनेक छात्रों का इन पर से भरोसा उठ चुका है। 

यह धारणा बन गई है कि सरकारी कॉलेजों से बस डिग्री ले लेनी है, ताकि नौकरी में जा सकें। मतलब एडमिशन लेना एक मजबूरी है। ट्यूशन फीस नामांकन शुल्क, परीक्षा शुल्क में बढ़ोतरी का खामियाजा लड़कियों को ज्यादा भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि परिवार में शिक्षा के मद में जब कटौती की बात आती है, तो लड़कियों की पढ़ाई ही रोकी जाती है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। दलील दी जाती है कि लड़कियां तो बगैर शिक्षा और रोजगार के भी रह सकती हैं, क्योंकि उन्हें आगे चलकर मुख्यत: घर का ही काम संभालना है। अगर फीस इसी तरह बढ़ती रही तो गरीब तबके को मन मारकर इस दौड़ से बाहर निकल जाना होगा। निश्चय ही उच्च शिक्षा से एक बड़े वर्ग का वंचित होना भारी सामाजिक असमानता पैदा करेगा और आर्थिक विभाजन को भी गहरा करेगा। इसे कौन रोकेगा? 

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