क्या खत्म हो रही है आरएलडी और टिकैत बंधुओं की दूरी? युद्धवीर सिंह की एंट्री से तेज हुई सियासी चर्चा

रालोद संसदीय बोर्ड में बीकेयू नेता को विशेष आमंत्रित सदस्य बनाए जाने के बाद पश्चिमी यूपी की राजनीति में नए समीकरणों की अटकलें

मेरठ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) और भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के बीच संबंधों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के राष्ट्रीय महासचिव युद्धवीर सिंह को आरएलडी के संसदीय बोर्ड में विशेष आमंत्रित सदस्य बनाए जाने के बाद राजनीतिक हलकों में इसे दोनों पक्षों के बीच बढ़ती नजदीकियों के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

हाल ही में गठित आरएलडी के संसदीय बोर्ड की पहली बैठक दिल्ली में हुई, जिसमें पूर्व सांसद के.सी. त्यागी को बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया। बैठक में आरएलडी अध्यक्ष जयंत चौधरी द्वारा युद्धवीर सिंह को विशेष महत्व दिए जाने की भी चर्चा रही, जिससे पश्चिमी यूपी में नए राजनीतिक समीकरणों की अटकलें तेज हो गई हैं।

पिछले कुछ महीनों में आरएलडी और टिकैत परिवार के बीच सार्वजनिक मतभेद भी सामने आए थे। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत की जयंत चौधरी पर की गई टिप्पणी, गंगनौली में दिल्ली-दून एक्सप्रेसवे पर कट की मांग को लेकर आंदोलन के दौरान आरएलडी और बीकेयू कार्यकर्ताओं के बीच तनाव तथा किसान मुद्दों पर अलग-अलग रुख ने दोनों संगठनों के रिश्तों में दूरी की चर्चा को बल दिया था।

इसी बीच गन्ना नियंत्रण आदेश-2026 को लेकर आयोजित बैठक में बीकेयू (अराजनीतिक) के नेता धर्मेंद्र मलिक को आमंत्रित किए जाने के बाद भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हुई थीं। अब युद्धवीर सिंह की संसदीय बोर्ड में एंट्री को लेकर यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले किसान राजनीति और आरएलडी के बीच फिर से तालमेल बन रहा है।

हालांकि, इस मुद्दे पर आरएलडी या भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) की ओर से किसी औपचारिक राजनीतिक गठबंधन या नई रणनीति की घोषणा नहीं की गई है। फिलहाल इसे राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा संभावित समीकरणों के रूप में देखा जा रहा है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आरएलडी और टिकैत परिवार के बीच निकटता का इतिहास पुराना रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह कई अवसरों पर किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के साथ खड़े दिखाई दिए थे। वर्ष 1999 में दोनों ने मिलकर किसान कामगार पार्टी का गठन कर चुनाव भी लड़ा था। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में आरएलडी ने राकेश टिकैत को अमरोहा से उम्मीदवार बनाया था, हालांकि उन्हें जीत नहीं मिल सकी।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों पक्षों के बीच सहयोग बढ़ता है तो इसका असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति और वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता है। हालांकि, इसकी वास्तविक तस्वीर आने वाले समय में दोनों संगठनों के राजनीतिक कदमों से ही स्पष्ट होगी।

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