कैसे हो बच्चियों की सुरक्षा
इलमा अज‍़ीम 
पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी इलाके के एक निजी स्कूल में महज तीन वर्षीय बच्ची के साथ उसी स्कूल के 57 वर्षीय कर्मचारी द्वारा दुराचार की घटना मनुष्य की रुग्ण और विक्षिप्त मानसिकता को व्यक्त करती है। इसी तरह कुछ दिनों पूर्व राजस्थान के श्रीगंगानगर में तेरह वर्ष की मासूम बच्ची के साथ हुई दरिंदगी एवं पश्चिम बंगाल के बरुईपुर में बारह वर्ष की अबोध बेटी से बलात्कार और फिर हत्या मानवता को शर्मसार करने वाली है। ये घटनाएं रूह को कंपकंपा देने वाली हैं। ऐसा लगता है कि जैसे कि इनसान हैवान हो गया हो।
 श्रीगंगानगर में घर से खेलने निकली बच्ची का रिक्शा चालक के द्वारा किडनैपिंग का शिकार होने, उसे बेचने के बाद शहर के तीन होटलों में एक सौ बीस घंटे तक बत्तीस लोगों की हवस का शिकार होती रही। विक्षिप्त मानसिकता के बत्तीस लोगों की आत्मा जैसे मर गई हो। इस दौरान किसी एक को भी घर में अपनी मां-बहन या बेटी को याद कर रहम नहीं आया। आज सारी मानवता शर्मसार है। आखिर क्या कसूर था उस मासूम बच्ची का? क्या बत्तीस लोगों में से किसी एक की अंतरआत्मा भी नहीं जागी? 

आज पूरे भारतवर्ष की बेटियों और बहनों की आंखों में करुणा के आंसू हैं, दहशत है और उन्हें असुरक्षा महसूस हो रही है। डर और खौफ के साये में जी रही ये बच्चियां न जाने कब और किस अप्रत्याशित दुराचार का शिकार हो जाए? यह प्रकरण दरिंदगी की इंतहा की कल्पना से भी परे है। यह प्रकरण महज एक घटना नहीं बल्कि इनसानियत पर एक काला धब्बा है। अफसोस है कि अनेकों ऐसे कुकृत्यों के बाद लोगों के द्वारा नारे, जुलूस, कैंडल मार्च, धरने और प्रदर्शन के बाद भी हमने कोई सबक नहीं लिया। दिल्ली में निर्भया तथा हिमाचल प्रदेश में गुडिय़ा जैसे घिनौने बलात्कार और हत्या के शर्मनाक मामलों के बाद भी हम कोई पुख्ता और असरदार कानून नहीं बना सके। 

हर बार पीडि़ताओं और उनके परिवारों को लंबी कानूनी प्रक्रियाओं के बाद यदि न्याय मिला भी होगा तो भी किसी परिजनों को उनकी जीवित बच्ची मिली? ऐसे दुष्कर्मियों को तो तुरंत फांसी की सजा मिलनी चाहिए। बलात्कार और हत्या के मामलों को अक्षम्य अपराध की श्रेणी में लाया जाना समय की पुकार है। इन लोगों को कड़ी से कड़ी सजा देने के लिए सख्त कानून की आवश्यकता है। आज पूरे देश में बच्चियों, बेटियों और महिलाओं की सुरक्षा एक यक्ष प्रश्न बन चुका है।

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