क्या सभ्य समाज की पहचान यही है?
- कृष्ण कुमार निर्माण
उम्र मात्र तरह साल और बाइस वहशी दरिंदों द्वारा रेप,ऐसी खबरें वाकई रूह कपा देने वाली हैं और किसी भी संवेदनशील इंसान को भीतर तक झकझोर देती हैं।जब हम तकनीक, चांद-मंगल के अभियानों और बराबरी की बातें कर रहे 21वीं सदी के भारत को देखते हैं, और दूसरी तरफ ऐसी भयानक दरिंदगी और क्रूरता की खबरें सुनते हैं,तो यह सोचना बिल्कुल स्वाभाविक है कि क्या इंसान सच में 'वहशी जानवर' हो गया है? या फिर क्या हमारा पूरा समाज अंदर से सड़ चुका है?सम्भवतः यह सभ्य समाज की पहचान तो कतई नहीं कही जा सकती और ऐसे कितने ही उदाहरण होंगे,जो खबरों तक में नहीं आते...क्योंकि उसके पीछे बहुत सारे कारण हैं?
हाल के दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से आईं आपराधिक घटनाएं—चाहे वह एक मासूम बच्ची के साथ सामूहिक हैवानियत हो,या फिर वैवाहिक रिश्तों में चरम हिंसा और क्रूरता- यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि हम एक समाज के तौर पर किस दिशा में जा रहे हैं।क्या यह 'प्रगति' का दौर है या नैतिक पतन का चरम?इस स्याह हकीकत को समझने के लिए हमें इसके पीछे के कारणों को गहराई से देखना होगा।वैज्ञानिक और सामाजिक नजरिए से देखें तो यह पूरी तरह सच नहीं है कि पूरा समाज बिगड़ चुका है,लेकिन यह बिल्कुल सच है कि समाज का एक हिस्सा चरम मानसिक विकृति का शिकार हो चुका है।अक्सर हम गुस्से में कह देते हैं कि इंसान 'जानवर' हो गया है,लेकिन हकीकत यह है कि कोई भी जानवर अपनी ही प्रजाति के साथ ऐसी सुनियोजित क्रूरता या विकृति नहीं दिखाता।
यह विशुद्ध रूप से मानव-मस्तिष्क का भटकाव है। जब इंसान के भीतर से सहानुभूति, कानून का डर और नैतिक मूल्य पूरी तरह खत्म हो जाते हैं, तब वह इस कदर हिंसक हो उठता है। ऐसी भयावह घटनाओं के पीछे कोई एक कारण नहीं होता, बल्कि यह कई सामाजिक, मानसिक और तकनीकी कारकों का मिलाजुला परिणाम है जैसे कि सहानुभूति का अभाव, आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ और एकाकीपन ने इंसान को आत्मकेंद्रित बना दिया है। जब कोई व्यक्ति दूसरे के दर्द को महसूस करने की क्षमता खो देता है,तो वह किसी भी हद तक गिर सकता है।
आज इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी, डार्क वेब और हिंसक कंटेंट की बाढ़ आई हुई है।लगातार ऐसा कंटेंट देखने से इंसानी दिमाग 'डी-सेंसिटाइज' हो जाता है।जो चीज पहले विचलित करती थी, वह धीरे-धीरे सामान्य लगने लगती है।रिश्तों में होने वाली हत्याओं के पीछे अक्सर लंबे समय से दबा हुआ गुस्सा,घरेलू हिंसा, अवैध संबंध या अचानक उपजा तीव्र आक्रोश होता है।आज के समय में लोगों में 'आवेग नियंत्रण' यानी अपने गुस्से पर काबू रखने की क्षमता तेजी से घट रही है।
कई बार अपराधियों को लगता है कि वे कानून की कमियों का फायदा उठाकर बच निकलेंगे। जब तक न्याय प्रक्रिया में देरी होती है, तब तक अपराधियों के हौसले बुलंद रहते हैं।हमें यह तथ्य हमेशा याद रखना चाहिए कि इस विकृति को केवल जेल या फांसी के डर से पूरी तरह नहीं रोका जा सकता, क्योंकि अपराध होने के बाद की सजा से पीड़ित का नुकसान वापस नहीं होता। इसके इलाज की शुरुआत बुनियाद से करनी होगी जैसे कि मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना। हमारे समाज में शारीरिक बीमारी पर तो बात होती है,लेकिन मानसिक विकृति या तनाव को नजरअंदाज किया जाता है।स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर मानसिक परामर्श अनिवार्य होना चाहिए ताकि हिंसक या विकृत प्रवृत्तियों को शुरुआती स्तर पर ही पहचाना और सुधारा जा सके।
21वीं सदी की शिक्षा केवल डिग्री और पैकेज तक सीमित हो गई है। शिक्षा और पारिवारिक परवरिश में सहानुभूति,सहमति का सम्मान और 'भावनाओं के प्रबंधन को शामिल करना होगा।लड़कों को बचपन से ही महिलाओं के प्रति सम्मान और संवेदनशील होना सिखाना सबसे बुनियादी जरूरत है।कानून का डर तभी होगा जब न्याय तेजी से मिलेगा।सालों साल चलने वाले मुकदमों के कारण अपराधियों में डर खत्म हो जाता है।ऐसी जघन्य घटनाओं में 'फास्ट ट्रैक' अदालतों के जरिए त्वरित और इतनी कठोर सजा होनी चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने।इंटरनेट पर परोसे जा रहे विकृत और हिंसक कंटेंट पर सख्त निगरानी और सेंसरशिप की जरूरत है। तकनीक जहां प्रगति का साधन है, वहीं इसे मानसिक पतन का जरिया बनने से रोकना सरकारों और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।
समाज पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। आज भी दुनिया में अच्छाई और इंसानियत जिंदा है, इसीलिए ऐसी खबरें हमें विचलित करती हैं। लेकिन इन घटनाओं को 'अपवाद' मानकर आंखें मूंद लेना भी आत्मघाती होगा।यह हमारे समाज के लिए एक चेतावनी की घंटी है।अगर हम अब भी केवल भौतिक प्रगति के पीछे भागते र5हे और नैतिक व मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करते रहे,तो यह खाई और गहरी होती जाएगी।प्रगति तभी सार्थक है जब इंसान के भीतर की इंसानियत सुरक्षित रहे।आइए!वक्त रहते चेते और हर तरह से इसका इलाज करें तभी बचाव हो सकता है।






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