राजनीति और वैचारिक प्रदूषण
 इलमा अज‍़ीम 
विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के उल्टे-सीधे बयान इन दिनों लगातार सुर्खियां बने रहते हैं। ऐसा लगता है कि राजनीति में कोई भी व्यक्ति किसी भी सीमा तक जा सकता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में वैयक्तिक मर्यादाएं भी अवश्य होनी चाहिए। किसी भी राजनीतिक नेता का जीवन सार्वजनिक होता है। समय-समय पर वाक युद्ध, व्यंग्यबाण, आरोप-प्रत्यारोप, नोक-झोंक अवश्य रहती है फिर चाहे जनसभाओं, विधानसभाओं, लोकसभा या फिर देश के सर्वोच्च सदन राज्यसभा में गर्मागर्म बहस तो देखने को मिलती है, लेकिन व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में सम्बन्धों की गर्माहट कभी खत्म नहीं होती। हालांकि राजनीतिक जीवन में सिद्धांतों और मानवता के मापदंडों का कोई महत्व नहीं रह जाता, क्योंकि प्रतिस्पर्धा और एक-दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में राजनीतिक हितों को साधने के लिए हम किसी भी स्तर पर चले जाते हैं जो कि व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से बिल्कुल न्यायसंगत नहीं है।

 आश्चर्य यह है कि राजनीति में सब कुछ होने तथा सब सीमाएं लांघने के बाद इस तरह से सुलह हो जाता है जैसे कि कुछ हुआ ही ना हो। अब यह पता नहीं कि यह शर्मिंदगी की या बेशर्मी की हद होती है। भारतवर्ष की राजनीति में बड़े-बड़े नेताओं के बहुत से किस्से इतिहास में दर्ज हैं। दलबदल और फिर घर वापसी भारतीय राजनीति में एक आम बात है। 

नेता अपने विरोधी, प्रतिस्पर्धी नेताओं तथा राजनीतिक दलों का जम कर अपमान करते हैं, परस्पर मानहानि के मुकदमे दर्ज हो जाते हैं, मुआवजे की मांग की जाती है लेकिन फिर भी विचारों और विचारधाराओं में समानता न होने के बावजूद नेता इतनी आसानी से घुल-मिल जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही ना हो। दु:खद है कि वर्तमान में राजनीतिक धमाचौकड़ी, धींगामुश्ती और लोकतान्त्रिक स्वतंत्रता की आड़ में हमें किसी भी हद तक जाने का लाइसेंस प्राप्त है। राजनीतिक खिलाड़ी खेल रहे हैं। जनता मूकदर्शक बनकर तमाशा देख रही है। 

व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता है। चारों ओर विचारों का प्रदूषण है। व्यक्तिगत रूप से आप एक दूसरे पर जितना प्रहार करें, जो भी आरोप-प्रत्यारोप, नोक-झोंक करें। सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा प्रिंट मीडिया का जमकर दुरुपयोग करें, लेकिन आचार-व्यवहार तथा विचारों के सामाजिक प्रदूषण का क्या होगा? 

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